Valentine’s Day : प्रेम की कोई तय परिभाषा देना या कहना हमारे बस की बात नहीं..

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बिपिन बिहारी : प्रेम तो सिर्फ प्रेम होता है ना कोई स्वार्थ ना ही कोई लालच, न पाने की खुशी और न ही खोने का डर। प्रेम कोई लक्ष्य नहीं जिसे पाना एकदम से जरूरी हो प्रेम तो अविरल होता है अनंत होता है निस्वार्थ होता है। अगर आप प्रेम मे हैं तो फिर आपको सिर्फ अपने प्रेमी की चिंता होती है। खुद के लालच और स्वार्थ में प्रेम का होना संभव ही नहीं है। दरअसल, जो एक दूसरे के लिए ना हो प्रेम कैसे हो सकता है?

जब आप किसी के प्रेम में होते हैं तो हर लम्हा हर दिन हर वीक वैलंटाइन्स होता है। बाकी तो सब छलावा है, ढोंग है, हवस है, बेईमानी है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि किसी से प्यार करने के लिए क्या क्या मायने होने चाहिए क्या किसी को देख लेना उसकी दैहिक ख़ूबसूरती या उसकी आंखे या फिर उसकी मीठी मीठी प्यारी बाते ही प्रेम होने का कारण है? अगर हाँ तो वो प्यार कैसे हो सकता है? वो तो आसक्ति होगा जो बहुत से लोगों को अलग अलग चीजों से हो जाती है। हम आसक्ति को प्रेम से कैसे जोड़ देते है? 

इंटरनेट के इस दौर में, प्यार सेक्स और धोखे के दौर में क्या वाकई निश्छल प्रेम जैसी कोई चीज हो सकती है? क्या कोई पैमाना है जिससे हम माप सकें की यही प्रेम है सच्चा प्रेम है? हम हर साल वैलंटाइन्स मनातें है; आखिर ये प्रेम के लिए सिर्फ एक दिन ही क्यों मुकर्रर करके रखा गया है? कौन है वो? किसने रखा? हम पूछना चाहतें हैं प्रेम के लिए एक दिन ही क्यूँ?

समाज का कोई भी बंधन कोई भी कानून कोई भी रिवाज या रवायत प्रेम के आड़े नहीं आ सकती। प्रेम तो वैसे ही अमर हैं जैसे आत्मा अमर है। प्रेम की कोई तय परिभाषा देना या कहना हमारे बस की बात नहीं इसके लिए कोई प्रेम ग्रंथ हो तो भी मैं उसे नहीं मानता क्योंकि वहाँ भी कुछ खामियाँ हो सकती हैं। लेकिन, प्रेम मे तो कोई खामी ही नहीं है प्रेम तो सिर्फ प्रेम है।

आप सभी वैलंटाइन्स डे मनाइए लेकिन वो नहीं जो सिर्फ दैहिक सौंदर्य तक सीमित है। वो नहीं जो सिर्फ उसके गुलाबी गालों तक है। वो नहीं जो उसकी बड़ी बड़ी आंखो, उसके घुँघराले बालों तक सीमित है। वो नहीं जो सिर्फ पाना जानता है। वो नहीं जो सिर्फ उसे अपनी हवस को पूरा करने तक सीमित है। बल्कि, वो जो उसके आत्मा से है उसके शरीर से परे है।