UP : लेफ्ट को नहीं खुद को ‘राईट’ करने से मज़बूत होगी कांग्रेस

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अमित राज पाण्डेय / लखनऊ : कांग्रेस पार्टी की अपनी स्वतंत्र विचारधारा रही और उसकी छाप देश की सांस्कृतिक और सामाजिक ताने बाने में दिखाई पड़ती है। लेकिन बदलते दौर के साथ पार्टी के भीतर एक दूसरी विचारधारा जिससे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु भी सहमत नहीं थे, वह घुसपैठ कर रही है। वामपंथ और कांग्रेस दो विपरीत धाराएँ हैं। वामपंथ और दक्षिणपंथ एक तरफ और कांग्रेस दूसरी तरफ। दक्षिणपंथ को तो नेहरु जी नें सिरे से ख़ारिज किया था। क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या के दाग इस विचारधारा के ऊपर आज भी हैं। दक्षिणपंथ दरअसल फांसीवादी विचारधारा है।

2004-2009 तक वामपंथी दलों ने कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार का बाहर से समर्थन किया था। साल 2004 के चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था और मनमोहन सिंह की सरकार के गठन में दूसरी पार्टियों के साथ-साथ वामपंथी पार्टियों का भी बेहद अहम किरदार था। लेकिन उस वक्त भी गठबंधन का आधार सिर्फ और सिर्फ धर्म निरपेक्षता की भाव अभिव्यक्ति थी। लेकिन आज जिस तरह वामपंथ कांग्रेस के भीतर आकार ले रहा है यह चिंता का विषय है।

एक पार्टी जिसका इतिहास काफी समृद्ध रहा, जिसनें स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिसने भारत को विश्व के शक्तिशाली देशों की कतार में लाकर खड़ा किया, जिसनें विश्व बंधुत्व और पंचशील का सिद्धांत दिया आज वह पार्टी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। संघर्ष करके तो हम अपने अस्तित्व की लड़ाई फिर भी जीत जायेंगे लेकिन पार्टी के भीतर वामपंथ का आक्रमण हमें खत्म कर देगा।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में सभी महत्वपूर्ण पदों पर वामपंथी पृष्ठभूमि से आयातित लोगों को बैठाया गया है जो वैचारिक रूप से स्वीकार करने लायक नहीं है। विश्व बंधुत्व, धर्म निरपेक्षता की विचारधारा पर ‘लाल सलाम’ की रक्तरंजित काली छाया पड़ गयी है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी के सहायक संदीप सिंह जो पूर्व में AISA के जेएनयू अध्यक्ष रहे हैं; के जरिये राज्य इकाई के महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों एवं सोशल मीडिया प्रभारी के रूप में लेफ्ट से आयातित लोगों को बिठाया गया है। वहीँ, पुराने लोगों को जिन्होंने कांग्रेस और उसकी विचारधारा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया उन्हें पार्टी नें या तो बाहर का रास्ता दिखा दिया या उनकी जरूरत पार्टी में ख़त्म कर दी।

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वामपंथ के मॉडल पर आप पार्टी नहीं चला पाएंगे। वामपंथ खुद ख़त्म होने की कगार पर है और कहीं न कहीं वामपंथ से लगाव कांग्रेस के स्वर्णिम इतिहास से मजाक है। कांग्रेस पार्टी जिन नए सलाहकारों के हिसाब से संगठन को चलाने का प्रयास कर रही हैं उसका हासिल कुछ नहीं होने वाला। लेफ्ट देश के लिए राईट नहीं है तो कांग्रेस के लिए कैसे राईट हो सकती है। जनता नें जिन्हें खारिज कर दिया हो उसे अपनाकर आप खुद क्यों ख़ारिज होना चाहते हैं यह बात समझ से परे है।

धर्म निरपेक्षता एक बेहतरीन विचार था लेकिन तुष्टिकरण के संक्रमण से यह प्रभावित होकर अपनी मूल भावना को खो बैठा। और, कहीं न कहीं धर्म निरपेक्षता के कमजोर होने और तुष्टिकरण के प्रभाव से ही दक्षिणपंथ को ऊर्जा मिली। देश की बहुसंख्यक आबादी की उपेक्षा और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण नें पार्टी की नींव खोद डाली। धर्मनिरपेक्षता में भाव में यह कतई नहीं था कि आप एक बड़े वर्ग को सिर्फ इसलिए वंचित रखें कि वह संख्याबल के हिसाब से सक्षम है। कभी कभी हम जो देखते हैं वह वैसा नहीं होता है।

पूरे देश में कांग्रेस कमजोर होती जा रही है बावजूद लोगों को विश्वास है कि सबसे पुरानी पार्टी फिर से खड़ी होगी और लोगों की आकाँक्षाओं को पूरा करेगी। आज भी एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के प्रति विश्वास रखता है लेकिन क्या हम उस विश्वास को कायम रख पा रहे हैं यह पार्टी को सोचने की जरूरत है। यह वक़्त बेजा प्रयोग का नहीं है। पार्टी को अपना स्टैंड क्लियर करना होगा और लोगों के लिए सड़कों पर उतरना होगा। एक ऐसे दौर में जब लोग अपनी व्यक्तिगत पहचान खोकर ‘भीड़’ में तब्दील होते जा रहे हैं सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही है जो फिर से उन्हें उनकी पहचान वापस दिला सकती है।

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