प्रतीकों के माध्यम से संवाद तो ठीक, लेकिन कहीं आंकड़ो में अपवाद तो नहीं बनना चाहते पीएम मोदी?

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द लोकतंत्र / सुदीप्त मणि त्रिपाठी : विश्वभर में कोरोना का कहर जारी है तेजी से आंकड़े बढ़ रहे हैं लोग मर रहे हैं वहीँ पीएम मोदी नें शुक्रवार सुबह नौ बजे प्रसारित अपने 12 मिनट लंबे वीडियो संदेश में पांच अप्रैल को रात्रि नौ बजे नौ मिनट के लिए घर लाइट्स बंद करके एक दीया, मोमबत्ती या मोबाइल फ्लैश लाइट जलाने की अपील की है। इस अपील के बाद सोशल मीडिया पर जारी बहस के बीच जहाँ कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं वहीँ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसमें राजनीति न देखते हुए इसका समर्थन भी कर रहे हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक देशभर में संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 2301 हो गई है। कोरोना के मामले लगातार बढ़ भी रहे हैं जो यकीनन चिंता का विषय है। लेकिन, जारी आंकड़ो के बीच जिस तरह की तस्वीरें आनंदविहार से मजदूरों का पलायन, तबलीगी ज़मात के धार्मिक आयोजनों वगैरह में हमने अपने सामने देखी वह यह बताती हैं कि यह आंकड़े तो ट्रेलर मात्र है असली तबाही की तस्वीरें अभी छुपी हुयी हैं। और, मोदी सरकार कोरोना मामले में जिस तरह सीमित टेस्टिंग की नीति अपना रही है उसमें दोराय नहीं कि आंकड़ो से हम खेल जायेंगे और सही तस्वीर कभी सामने नहीं आ पायेगी।

चलिए एकबारगी यह मान लेते हैं कि, 5 अप्रैल को रात 9 बजे 9 मिनट के लिए दीये या टॉर्च जलाने में कोई दिक्कत नहीं है और इस 9 मिनट के एक कार्यक्रम में हम करोड़ों भारतवासी कोरोना के खिलाफ एकजुटता दिखाते हैं तो भी इसका फायदा क्या है? कहीं प्रधानमंत्री मोदी प्रतीकों के माध्यम से इटली के से हालात के लिए तैयार रहने की महत्वपूर्ण सूचना तो बिना कहे नहीं न देना चाहते हैं क्योंकि यह सबकुछ जो हम दोहरा रहे हैं वह इटली में भी की जा चुकी है। प्रतीकों के माध्यम से किया गया संवाद दोहरे अर्थ लिए होता है। अगर हम सकारात्मक पहलु देख रहे हैं तो हमें नकारात्मक पहलुओं पर भी चर्चा जरूर करनी चाहिए।

125 करोड़ से ज्यादा की जनसँख्या वाले देश में सीमित कोरोना टेस्ट की नीति ही फरेब है। सरकार का यह रवैया बता रहा है कि उन्हें आपकी फिक्र कतई नहीं है। लॉकडाउन या किसी अन्य तरह का प्रतिबंध तब तक निरर्थक है, जब तक इसके साथ विस्तृत तौर पर टेस्टिंग न की जाए।

कोरोना वारियर्स बढ़िया शब्द है लेकिन आपको यह भी पता होना चाहिए आपके यह वारियर्स जान जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं । निजी सुरक्षा उपकरण, दस्ताने, एन -95 मास्क, वेंटिलेटर इत्यादि का बड़े पैमाने पर जरूरत है लेकिन केंद्र सरकार उपलब्ध नहीं करा पा रही। ताली बजाना भी ठीक था और दिया जलाना भी ठीक ही होगा। सब करेंगे तो यकीनन मैं भी पीछे नहीं हटूंगा और अपने घर के बालकनी में मोबाइल का फ्लैश लाइट जरूर जलाऊंगा लेकिन रौशनी की चकाचौंध के बीच अपनी आँखों को इस कदर अँधा बिलकुल भी न कर लीजियेगा कि आपको सच भी धुंधला नज़र आये और सच यही है कि कोरोना से लडाई की इस जंग में हम अपनी सरकारों की काहीलियत की वजह से हार रहे हैं। भारत में सबसे कम कोरोना पीड़ित तो हम दिखा ले जायेंगे लेकिन आंकड़ो की इस बाजीगरी में बहुत से लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा ।

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