72 साल की आज़ादी के बाद भी श्रमिक-वर्ग अभी भी विकास की मुख्यधारा से बहुत दूर

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रमेन्द्र त्रिपाठी / नज़रिया : प्रवासी मजदूरों के सम्बंध में कोई सूचना पंजीकृत या उनका प्रामाणिक विवरण सूचीबद्ध तो है नहीं हालाँकि 2011 के सेन्सस में 6 करोड़ माइग्रेंट मज़दूरों की बात कही गयी है जो अब 9 वर्षों में बढ़ कर अनुमानतः 8 करोड़ तो हो ही गयी होगी। दिक्कत यह है कि उसे अपडेट करने की कोई कोशिश नहीं की गयी तथा उक्त के विषय में सूचना या विवरण तैयार करने का कोई प्रयास किसी सरकार ने कभी नहीं किया।

कृपा कर के जनधन के खातों से प्रवासी मज़दूरों को जोड़ कर इस पूरे प्रकरण को अत्यंत सरलीकृत करने की चेष्टा न करें। यह एक लम्बी बहस का विषय है तथा इसे सरलीकृत कर प्रस्तुत कर देने से समस्या सुलझेगी नहीं अपितु अपेक्षाकृत और जटिल हो जाएगी। कल्पना करें कि यदि सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी भी गयी होती अथवा भविष्य में सरकार द्वारा कभी आर्थिक सहायता दिए जाने का निर्णय लिया भी जाता है तो भी समस्या यही होगी कि उक्त राशि किस खाते में अंतरित की जाय। किसी सरकार ने इस विषय में कभी चिन्ता नहीं की। सूचना उपलब्ध होने के बाद उसे सिस्टम में फीड करना और उसे बैंकिंग सिस्टम और प्रोसीजर के साथ जोड़ना काफ़ी श्रमसाध्य एवं समयसाध्य कार्य है।

कुछ योजनाबद्ध कार्य तो अभी तक इस दिशा में हुआ नहीं और सभी लोग मुख्यतः विपक्षी दल आर्थिक सहायता की बात कर रहे हैं पर इसका क्रियान्वयन कैसे होगा इस विन्दु पर विचार करने की फ़ुर्सत किसी को भी नहीं है। बस लफ़्फ़ाज़ी का बाज़ार गर्म है। बुनियादी हक़ीक़त को दरकिनार कर केवल भावना के आधार पर दूरगामी फ़ैसले नहीं लिए जा सकते हैं।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का उदाहरण लें, इस महत्वाकांक्षी योजना से भी बहुत सारे किसान वंचित हैं। इसका कारण यही है कि उनके विषय में सूचना सिस्टम में फीड नहीं है। जो पहली बार उस सम्मान निधि को पा गए, पा गए। और, वही बार बार पा रहे हैं। बाक़ी किसान जिनका नाम अभी तक फीड नहीं हो सका है तहसील- कचहरी की दौड़ लगा कर लगभग थक चुके हैं और निराश हो कर अवसादग्रस्त अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

सरकार की अच्छी नीयत, अच्छे इंटेंशन्स के बावजूद लाभ बहुत से पात्र किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है। अतः केन्द्र और राज्य सरकारों को प्रवासी मज़दूरों के संबंध में परिश्रम तथा सावधानीपूर्वक समस्त सूचनाएं प्रामाणिक रूप से संग्रहीत करनी चाहिए और उसका विश्वसनीय Data-bank तैयार करना चाहिए अन्यथा किसी भी घोषणा अथवा योजना का क्रियान्वयन सुचारू रूप से नहीं हो पायेगा। यक़ीनन आप के इरादे नेक होंगे किन्तु परिणाम हास्यास्पद और सभी घोषणाएं मात्र हवाहवाई हो कर रह जाएंगी और जनोपयोगी योजनाएं अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगी।

केन्द्र और राज्य सरकारें एक दूसरे की पीठ थपथपायेंगीं पर ‘लाभ’ अधिकांश लाभार्थीगण को नहीं प्राप्त हो सकेगा। अतः यह नितान्त आवश्यक है कि केन्द्र और राज्य सरकारें इस दिशा में ठोस और परिणाममूलक कार्यवाही करें अन्यथा मनोवांछित रिजल्ट प्राप्त नहीं हो सकेगा।

प्रवासी मज़दूरों का ठीक से वर्गीकरण कर के उनकी पृथक से प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक सूची बनाना बहुत ज़रूरी है अन्यथा जनधन के खातेदारों के साथ उन्हें सम्मिलित करने से confusion और बढ़ेगा। डुप्लीकेशन को अवॉयड करने के लिए यह उचित होगा कि जनधन के खातेदारों की सूची को पुनरीक्षित किया जाय तथा प्रवासी और अन्य मज़दूरों के खाते पृथक से खोले जाँय और उन्हें यथासम्भव उनकी स्किल के अनुरूप राज्य में ही रोजगार उपलब्ध कराया जाय।

राज्य के अन्दर एवं राज्य के बाहर काम करने वालों श्रमिकों को सूचीबद्ध करते हुए उन कारणों की भी समीक्षा की जाय जिसकी वज़ह से 72 साल की आज़ादी के पश्चात भी श्रमिक-वर्ग अभी भी विकास की मुख्यधारा से बहुत दूर है। यह बड़ा मानवीय सवाल है जिसके तत्काल समाधान की दिशा में ठोस एवं कारगर कार्यवाही केन्द्र और राज्य सरकारों को समयबद्ध और प्रभावी रूप से सुनिश्चित करना चाहिए।

सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं में यक़ीन करती है। इसकी कसौटी इस बिंदु पर सरकार की सक्रियता ही होगी। मुझे विश्वास है कि इस सुझाव पर शासन गम्भीरतापूर्वक विचार करने की कृपा करेंगे। जनहित के कार्य में विलंब की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। कठिन और मुश्किल समय में ही चुनौतीपूर्ण कार्य सम्पादित हो पाते हैं। हर वर्ग के श्रमिकों की पहचान तथा बैंक्स में उनका खाता संचालन निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक पहल होगी तथा इतिहास में इस पहल को स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाएगा। जय हिन्द !

( लेखक उत्तर प्रदेश शासन के प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। सचिव वित्त व गृह के अलावा कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। रिटायरमेंट के बाद विश्व बैंक के मुख्य साउथ पैसिफिक रीजन के चीफ एडवाइजर भी हैं। )

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