द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : नेपाल में एक बार फिर भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए, जिससे लोगों में अफरा-तफरी मच गई। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 4.0 दर्ज की गई। झटके महसूस होते ही लोग अपने घरों और दफ्तरों से बाहर निकलकर सुरक्षित जगह की ओर भागने लगे। हाल ही में शुक्रवार, 12 सितंबर 2025 को भी नेपाल में 5.0 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके झटके उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भी महसूस किए गए थे। लगातार आ रहे इन झटकों ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
हिमालयी क्षेत्र में क्यों बार-बार आते हैं भूकंप
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है। यहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की लगातार टक्कर से ज़मीन के भीतर तनाव जमा होता है, जो समय-समय पर भूकंप के रूप में बाहर निकलता है। नेपाल में हर साल छोटे से मध्यम स्तर के कई भूकंप दर्ज किए जाते हैं। हालांकि, अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों और काठमांडू जैसे घनी आबादी वाले शहरों में इमारतें भूकंप-रोधी नहीं हैं। यही कारण है कि हल्के झटके भी लोगों के लिए डर का कारण बन जाते हैं।
भूकंप से भूस्खलन का बढ़ता खतरा
नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में भूकंप अक्सर भूस्खलन को भी ट्रिगर कर देते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान बढ़ सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि विशेष रूप से मानसून के मौसम में भूकंप से भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ग्रामीण इलाकों में सड़कें, पुल और छोटे बांध ऐसे हादसों से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं।
2015 का विनाशकारी भूकंप अब भी याद
25 अप्रैल 2015 को नेपाल ने इतिहास के सबसे भयानक भूकंपों में से एक देखा था। 7.8 तीव्रता के इस भूकंप ने लगभग 9,000 लोगों की जान ले ली और 22,000 से अधिक लोग घायल हुए थे। काठमांडू घाटी में सदियों पुराने मंदिरों, शाही महलों और स्मारकों को भारी नुकसान पहुंचा था। काठमांडू, ललितपुर और भक्तपुर की लगभग 90 फीसदी प्राचीन धरोहरें तबाह हो गई थीं। पशुपतिनाथ मंदिर परिसर और स्वयंभूनाथ स्तूप जैसे धार्मिक स्थलों को भी क्षति पहुंची थी।
2015 की तबाही के बाद नेपाल ने अपने पुनर्निर्माण कार्यों पर ज़ोर दिया। पिछले 10 वर्षों में हजारों स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक भवन दोबारा खड़े किए गए। लगभग 90 फीसदी घरों का पुनर्निर्माण हो चुका है। काठमांडू के मंदिर और सांस्कृतिक स्थल भी धीरे-धीरे अपनी पुरानी चमक वापस पा रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी बुनियादी ढांचा कमजोर है और वहां भूकंप-रोधी निर्माण की ज़रूरत है।

