द लोकतंत्र : कार्तिक मास में आने वाली बैकुंठ चतुर्दशी का पावन पर्व श्रद्धा, भक्ति और हरि-हर के अटूट मिलन का प्रतीक है। यह एकमात्र दिन है जब भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की एकसाथ उपासना का विशेष विधान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन स्वयं भगवान विष्णु ने काशी में भगवान शिव की आराधना कर उन्हें सहस्र कमल अर्पित किए थे। तभी से यह पर्व शिव और विष्णु की एकता और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।
बैकुंठ चतुर्दशी की तिथि इस बार मंगलवार यानी 4 नवंबर को है। चतुर्दशी तिथि की शुरुआत दोपहर 2 बजकर 05 मिनट से शुरू हो रही है और रात 10 बजकर 36 मिनट पर इसका समापन है। इस पावन अवसर पर भगवान विष्णु और शिव की पूजा करते समय उनकी कथा और आरती जरूर पढ़नी चाहिए, क्योंकि इनके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
बैकुंठ चतुर्दशी पर पढ़ें व्रत कथा (Vaikunth Chaturdashi Katha)
पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार भगवान विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। वहां मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने के बाद, उन्होंने 1000 (एक हजार) स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान विश्वनाथ के पूजन का संकल्प लिया। जब वे अभिषेक के बाद विधि-विधान से पूजन करने लगे, तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से उन 1000 कमल पुष्पों में से एक कमल पुष्प कम कर दिया।
भगवान श्रीहरि को पूजन की पूर्ति के लिए पूरे 1000 कमल पुष्प चढ़ाने थे, लेकिन एक पुष्प की कमी देखकर वे चिंतित हुए। तभी उन्हें विचार आया कि लोग मेरी आंखें भी तो कमल के ही समान हैं, इसीलिए मुझे ‘कमल नयन’ और ‘पुंडरीकाक्ष’ कहा जाता है। यह विचार कर भगवान विष्णु बिना किसी संकोच के अपनी कमल समान आंख चढ़ाने को प्रस्तुत हुए।
विष्णु जी की इस अगाध भक्ति और समर्पण से देवाधिदेव महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और तुरंत प्रकट होकर बोले- “हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब ‘बैकुंठ चतुर्दशी’ कहलाएगी और इस दिन व्रतपूर्वक जो पहले आपका (विष्णु का) पूजन करेगा, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी।”
भगवान शिव ने इसी बैकुंठ चतुर्दशी को प्रसन्न होकर, करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला अपना दिव्यास्त्र सुदर्शन चक्र, भगवान विष्णु को प्रदान किया। शिवजी तथा विष्णुजी कहते हैं कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगे और मृत्यु लोक में रहने वाला कोई भी व्यक्ति जो इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा से करता है, वह मृत्यु के बाद अपना स्थान बैकुंठ धाम में सुनिश्चित करेगा।
बैकुंठ चतुर्दशी पर करें हरि-हर की आरती
बैकुंठ चतुर्दशी पर हरि और हर (विष्णु और शिव) दोनों की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की सबसे लोकप्रिय और हृदय को शांत करने वाली आरती, ‘ओम जय जगदीश हरे’ का पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी होता है।
॥ ओम जय जगदीश हरे… ॥
ओम जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे।
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ओम जय जगदीश हरे।
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ओम जय जगदीश हरे।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ओम जय जगदीश हरे।
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता। स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ओम जय जगदीश हरे।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे।
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ओम जय जगदीश हरे।
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ओम जय जगदीश हरे।
श्री जगदीश जी की आरती, जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपति पावे॥ ओम जय जगदीश हरे।

