द लोकतंत्र : वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक तनाव के चलते ऐतिहासिक गिरावट झेलने के बाद भारतीय रुपये ने सकारात्मक वापसी की है। बुधवार को आरंभिक कारोबार के दौरान रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 12 पैसे मजबूत होकर 89.51 के स्तर पर पहुंच गया। इस सुधार का मुख्य श्रेय भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा बाजार में तरलता (Liquidity) बढ़ाने के लिए की गई ₹3 लाख करोड़ की घोषणा को दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम ने न केवल मुद्रा बाजार को संभाला है, अपितु निवेशकों के मन में फलीभूत हो रहे अनिश्चितता के बादलों को भी छांटने का काम किया है।
आरबीआई का हस्तक्षेप: नकदी प्रवाह का प्रभाव
भारतीय रुपये में आई हालिया गिरावट, जिसमें यह 91 के स्तर को पार कर गया था, को रोकने के लिए आरबीआई ने बहुआयामी रणनीति अपनाई है।
- आरबीआई द्वारा 3 लाख करोड़ रुपये बाजार में डालने के निर्णय से बैंकिंग प्रणाली में फंड की कमी दूर हुई है। इसका सीधा असर अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार पर दिखा, जहाँ रुपया 89.56 पर खुलकर मजबूत हुआ।
- छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के बास्केट में डॉलर की शक्ति दर्शाने वाले ‘डॉलर इंडेक्स’ में 0.07 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो रुपये सहित उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं के लिए राहत लेकर आई।
पूंजी बाजार का रुझान: सेंसेक्स और निफ्टी में हरियाली
मुद्रा बाजार में आई स्थिरता का सकारात्मक प्रतिबिंब घरेलू शेयर बाजार पर भी दिखा।
- सेंसेक्स 63.82 अंक चढ़कर 85,588 के स्तर पर और निफ्टी लगभग 32 अंकों की तेजी के साथ 26,200 के ऊपर कारोबार करता दिखा।
- ट क्रूड का 62.39 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर रहना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान सिद्ध हो रहा है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
चुनौतियां अभी बाकी: विदेशी निवेशकों की बिकवाली
बाजार में आई तेजी के बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार सतर्क बने हुए हैं। मंगलवार को ₹1,794.80 करोड़ की शुद्ध बिकवाली यह संकेत देती है कि वैश्विक टैरिफ नीतियों और अस्थिरता को लेकर चिंताएं अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जब तक वैश्विक पोर्टफोलियो निवेशक पुनः खरीददार नहीं बनते, तब तक रुपये की यह मजबूती सीमित दायरे में रह सकती है।
स्थिरता की ओर कदम
आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि आरबीआई इसी प्रकार का सक्रिय हस्तक्षेप जारी रखता है और डॉलर में वैश्विक कमजोरी बनी रहती है, तो रुपया जल्द ही 88-89 के स्तर पर स्थिर हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी निर्णय और वैश्विक टैरिफ युद्ध की स्थितियां आने वाले महीनों के लिए महत्वपूर्ण ट्रिगर होंगी।
निष्कर्षतः, आरबीआई के समयबद्ध हस्तक्षेप ने रुपये को अत्यधिक गिरावट से बचा लिया है, किंतु वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर सतर्कता अभी भी अनिवार्य है।

