द लोकतंत्र : भारतीय खान-पान में चाय मात्र एक पेय नहीं, बल्कि एक भावना है। विगत कुछ वर्षों में स्ट्रीट फूड संस्कृति में ‘तंदूरी चाय’ ने अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। मिट्टी के कुल्हड़ से उठती वह सोंधी महक और स्मोकी फ्लेवर ने चाय प्रेमियों को अपना दीवाना बना दिया है। यद्यपि इसे बनाने के लिए पारंपरिक रूप से भट्टी या तंदूर का उपयोग होता है, किंतु मशहूर शेफ हरपाल सिंह सोखी ने हाल ही में एक ऐसी तकनीक साझा की है, जिससे आम रसोई में भी वही ढाबा स्टाइल स्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
दादी के नुस्खे से वैश्विक पहचान तक
- तंदूरी चाय का अविष्कार महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में हुआ। इस नवाचार के पीछे अमोल दिलीप राजदेव की सोच थी, जिन्होंने अपनी दादी द्वारा अलाव पर कुल्हड़ में हल्दी-दूध गर्म करने की पद्धति से प्रेरणा ली।
- राजदेव ने ‘चाई ला! द तंदूर टी’ नामक स्टॉल से इसकी शुरुआत की, जो आज दिल्ली, लखनऊ और मुंबई जैसे महानगरों में एक सफल बिजनेस मॉडल बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सफलता का मुख्य कारण मिट्टी के बर्तनों के प्रति बढ़ता पुरानी यादों (Nostalgia) का जुड़ाव है।
बिना तंदूर घर पर बनाने की प्रक्रिया: शेफ की गाइड
शेफ हरपाल सिंह सोखी के अनुसार, तंदूरी चाय का असली तत्व ‘स्मोक’ (धुआं) है, जिसे कोयले और कुल्हड़ की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है।
- मिट्टी के एक साफ कुल्हड़ को सीधे गैस की लौ पर तब तक गर्म करें जब तक कि वह लाल न हो जाए। यही वह बिंदु है जहाँ मिट्टी की सोंधी खुशबू सक्रिय होती है।
- समानांतर रूप से, दूध, अदरक और इलायची के मिश्रण को पकाएं। ध्यान रहे कि चाय को पूरी तरह पकने के बाद ही छाना जाए।
- गर्म कुल्हड़ के भीतर एक धधकता हुआ कोयला रखकर आधा चम्मच घी डालें। निकलने वाला सघन धुआं ही चाय में वह स्मोकी फ्लेवर प्रदान करता है जिसके लिए तंदूरी चाय प्रसिद्ध है।
स्वाद में मिट्टी का योगदान
- खाद्य वैज्ञानिकों का मानना है कि जब गर्म चाय अत्यधिक गर्म मिट्टी के संपर्क में आती है, तो एक विशेष रासायनिक प्रतिक्रिया होती है जिसे ‘मैलाईड रिएक्शन’ (Maillard Reaction) के समान माना जा सकता है। मिट्टी के सूक्ष्म छिद्र चाय की अम्लीयता को कम करते हैं और स्वाद को अधिक सौम्य बनाते हैं।
घर पर यह विधि अपनाते समय अत्यधिक सावधानी अनिवार्य है। गर्म कुल्हड़ और जलते कोयले के साथ कार्य करते समय चिमटे का उपयोग करें। शेफ सोखी का यह नुस्खा सिद्ध करता है कि रसोई में रचनात्मकता हो तो बिना महंगे उपकरणों के भी विश्वस्तरीय स्वाद प्राप्त किया जा सकता है।

