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Painkillers: तात्कालिक राहत या स्थायी बीमारी? बिना डॉक्टरी परामर्श के दवा लेना पड़ सकता है भारी

The loktnatra

द लोकतंत्र : आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक पीड़ा एक नियमित समस्या बन चुकी है, जिसके समाधान के रूप में ‘पेनकिलर्स’ (Painkillers) का उपयोग अभूतपूर्व दर से बढ़ा है। विश्व भर में प्रतिदिन लगभग 3 करोड़ लोग बिना किसी वैध परामर्श के नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) का सेवन करते हैं। हालिया चिकित्सीय रिपोर्ट्स ने चेतावनी दी है कि आइबुप्रोफेन, डायक्लोफेनाक और टाइलेनॉल जैसी दवाओं की सहज उपलब्धता ने इन्हें ‘साइलेंट किलर’ बना दिया है। यह लेख विश्लेषण करता है कि कैसे ये दवाएं अल्पकालिक आराम देकर महत्वपूर्ण अंगों को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर रही हैं।

आंतों का स्वास्थ्य एवं ब्लड फ्लो पर आघात

पेनकिलर्स का सबसे त्वरित किंतु अदृश्य दुष्प्रभाव पाचन तंत्र पर होता है।

  • गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल क्षति: एक शोध के अनुसार, नियमित पेनकिलर लेने वाले 75% उपयोगकर्ताओं की आंतों में सूजन पाई गई है। ये दवाएं सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में रक्त प्रवाह को बाधित करती हैं, जिससे आंतों की सुरक्षात्मक परत कमजोर हो जाती है।
  • अल्सर का खतरा: हर चौथे व्यक्ति में पेट के अल्सर की संभावना बढ़ जाती है, जिसके लक्षणों में काला मल, जी मिचलाना और इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS) शामिल हैं।

किडनी और लिवर: अंगों की विफलता का मुख्य कारण

किडनी और लिवर शरीर के प्राकृतिक फिल्टर हैं, किंतु दवाओं का अत्यधिक लोड इन्हें पूरी तरह ठप कर सकता है।

  • किडनी डैमेज: पेनकिलर्स वृक्क (Kidney) की नलिकाओं को संकीर्ण कर देती हैं, जिससे फिल्ट्रेशन की क्षमता क्षीण हो जाती है। कई मामलों में क्षति का पता तब चलता है जब किडनी 80% तक काम करना बंद कर देती है।
  • लिवर फेलियर: संयुक्त राज्य अमेरिका में 50% लिवर फेलियर के मामलों के लिए एसिटामिनोफेन (टाइलेनॉल) को उत्तरदायी माना गया है। सामान्य सर्दी-जुकाम की दवाओं में भी यह तत्व होने के कारण अक्सर मरीज अनजाने में इसका ओवरडोज ले लेते हैं।

मेडिकेशन ओवरयूज हेडेक: दर्द का दुष्चक्र

  • चिकित्सा विशेषज्ञों ने एक विचित्र किंतु गंभीर स्थिति ‘Medication Overuse Headache’ को चिह्नित किया है। यदि कोई व्यक्ति माह में 10 से 15 दिनों से अधिक सिरदर्द की दवा लेता है, तो उसका तंत्रिका तंत्र दवा पर निर्भर हो जाता है। परिणामस्वरूप, दवा का असर खत्म होते ही दर्द पुनः और अधिक तीव्रता के साथ लौटता है, जिससे मरीज एक अंतहीन चक्र में फंस जाता है।

वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट का सुझाव है कि पेनकिलर्स को ‘कैंडी’ की तरह इस्तेमाल करना बंद करना होगा। आगामी दशक में यदि स्व-उपचार (Self-medication) पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो डायलिसिस और लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की संख्या में 30-40% की वृद्धि हो सकती है। दवा लेने से पूर्व हमेशा लेबल पढ़ें और निर्धारित डोज का उल्लंघन न करें।

निष्कर्षतः, दर्द शरीर का एक संकेत है कि भीतर कुछ ठीक नहीं है। उस संकेत को बिना डॉक्टरी सलाह के दबाना खतरनाक हो सकता है। प्राकृतिक उपचार, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव को प्राथमिकता देना ही दीर्घकालिक स्वास्थ्य की कुंजी है।

Uma Pathak

Uma Pathak

About Author

उमा पाठक ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में स्नातक और बीएचयू से हिन्दी पत्रकारिता में परास्नातक किया है। पाँच वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाली उमा ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं। उमा पत्रकारिता में गहराई और निष्पक्षता के लिए जानी जाती हैं।

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