द लोकतंत्र : अक्सर मनुष्य अपने जीवन में आने वाली असफलताओं और मानसिक तनाव के लिए केवल बाहरी परिस्थितियों या दुर्भाग्य को उत्तरदायी मानता है। किंतु, वास्तु शास्त्र और वैदिक ज्योतिष का गहन विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि हमारी सूक्ष्म दैनिक आदतें ही नकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह का द्वार खोलती हैं। आधुनिक जीवनशैली में हम अनजाने में कुछ ऐसे कृत्य करते हैं, जो न केवल ग्रहों की स्थिति को शिथिल करते हैं, बल्कि वास्तु दोषों को भी आमंत्रण देते हैं। आइए, इन आदतों के पीछे छिपे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारणों का विश्लेषण करते हैं।
सूर्योदय के पश्चात जागरण: आत्मबल का ह्रास
ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना गया है। देर तक सोते रहने से व्यक्ति ब्रह्म मुहूर्त की दिव्य ऊर्जा से वंचित हो जाता है।
- ज्योतिषीय प्रभाव: देर से उठने से कुंडली में सूर्य निर्बल होने लगता है। इसका परिणाम आत्मविश्वास में कमी, कार्यस्थल पर अपमान और हड्डियों से जुड़ी समस्याओं के रूप में सामने आता है।
- समाधान: सूर्योदय से पूर्व उठना न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा को भी बढ़ाता है।
ऊर्जा का हस्तांतरण: दूसरों के वस्त्रों का प्रयोग
वास्तु शास्त्र के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट ‘ऑरा’ (Aura) या ऊर्जा मंडल होता है, जो उसके द्वारा उपयोग किए जाने वाले वस्त्रों में समाहित हो जाता है।
- जब हम किसी अन्य व्यक्ति के वस्त्र धारण करते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से उसकी नकारात्मकता या बीमारियां भी हमारे ऊर्जा तंत्र में प्रवेश कर सकती हैं। यह आदत भाग्य में अवरोध और मानसिक अशांति पैदा करती है। वास्तु विशेषज्ञों का परामर्श है कि स्वयं की पहचान और ऊर्जा को अक्षुण्ण रखने के लिए कपड़ों को साझा करने से बचना चाहिए।
नख कर्तन और भोजन संबंधी त्रुटियां: राहु का प्रकोप
दांतों से नाखून चबाना न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि यह मानसिक भ्रम को भी दर्शाता है। ज्योतिष में इसे कमजोर बुध और अशुभ शनि का संकेत माना जाता है, जो निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है।
- इसी प्रकार, बिस्तर पर बैठकर भोजन करना राहु को जाग्रत करता है। बिस्तर विश्राम का स्थान है, और वहां भोजन करने से अन्न का अपमान होता है। इससे आकस्मिक धन हानि और पारिवारिक कलह की संभावना बढ़ती है। इसके अतिरिक्त, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भोजन करना यम ऊर्जा को सक्रिय करता है, अतः हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा में बैठकर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
निष्कर्षतः, हमारा आचरण ही हमारे वास्तु का निर्माण करता है। भवन के वास्तु के साथ-साथ स्वयं के ‘व्यवहार वास्तु’ में सुधार लाना अनिवार्य है। इन छोटी किंतु महत्वपूर्ण बातों का अनुपालन करके हम ग्रह-दशाओं को अनुकूल बना सकते हैं और जीवन में समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

