द लोकतंत्र : सनातन परंपरा और वैदिक दर्शन में जीवन ही नहीं, अपितु मृत्यु के पश्चात भी मर्यादा के पालन पर विशेष बल दिया गया है। अक्सर देखा गया है कि किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसके जीवनकाल की त्रुटियों या कष्टों की चर्चा होने लगती है। किंतु, प्राचीन ग्रंथ और मनोवैज्ञानिक अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि मृत व्यक्ति की निंदा करना न केवल कायरता का प्रतीक है, बल्कि यह निंदा करने वाले व्यक्ति के कार्मिक चक्र (Karmic Cycle) को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। जब कोई व्यक्ति संसार त्याग देता है, तो वह आत्म-रक्षा या अपना पक्ष रखने की स्थिति में नहीं होता, अतः उसका अपमान मानवीय मूल्यों के विरुद्ध माना गया है।
कार्मिक लिंक: शारीरिक अंत के बाद भी सक्रिय ऊर्जा
आध्यात्मिक विशेषज्ञों का तर्क है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर का अंत है, सूक्ष्म ऊर्जा और भावनात्मक तंतु लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
- ऊर्जात्मक संबंध: जब हम किसी मृत व्यक्ति की बुराई करते हैं या उसका मजाक उड़ाते हैं, तो हमारा भावनात्मक संबंध उससे पुनः जुड़ जाता है। यह प्रक्रिया हमारी अपनी ‘हीलिंग’ (Healing) शक्ति में बाधा उत्पन्न करती है। शास्त्रीय मान्यता है कि निंदा करने से उस व्यक्ति के पापों का अंश भी हमारे खाते में स्थानांतरित होने लगता है।
- मनुस्मृति का कठोर मत: मनुस्मृति के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की पीठ पीछे बुराई करना अपराध है, किंतु मृत व्यक्ति का उपहास करना पाप की श्रेणी में आता है। माना जाता है कि ऐसे कृत्य से व्यक्ति के पुण्य क्षीण होते हैं।
महाभारत की सीख: भीष्म पितामह का संदेश
महाभारत के शांति पर्व में राजधर्म और नैतिकता का विस्तृत वर्णन मिलता है।
- जब युधिष्ठिर भीष्म पितामह से ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, तब पितामह ने स्पष्ट किया था कि एक श्रेष्ठ पुरुष वही है जो शत्रु की मृत्यु के बाद भी उसके प्रति सम्मान बनाए रखे। उनका कथन था कि मृत्यु के साथ ही सारे बैर समाप्त हो जाते हैं। यदि हम मरे हुए व्यक्ति की बुराई करते हैं, तो हम अपनी ही मानसिकता को कलुषित करते हैं। यह कृत्य यह नहीं दर्शाता कि वह व्यक्ति कैसा था, बल्कि यह दर्शाता है कि हम स्वयं कितने असुरक्षित और द्वेषपूर्ण हैं।
मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक प्रभाव
- मृत व्यक्ति की निंदा करना सामाजिक रूप से भी अनैतिक है। वह इंसान भले ही चला गया हो, किंतु उसके परिजन और मित्र अभी भी जीवित हैं। आपकी कटु वाणी उनके शोक को पीड़ा में बदल सकती है। इतिहास और समय ही किसी व्यक्ति के चरित्र का अंतिम न्याय करते हैं, क्षणिक भावनाओं में की गई निंदा अधूरा सत्य ही होती है।
निष्कर्षतः, प्रत्येक धर्म इस बात पर सहमत है कि मृत्यु के बाद इंसान सांसारिक मोह-माया से ऊपर चला जाता है। एक प्रबुद्ध समाज के रूप में हमें मृतकों की केवल अच्छाइयों को याद करना चाहिए या मौन रहना चाहिए। यह न केवल दिवंगत आत्मा के प्रति सम्मान है, बल्कि स्वयं की मानसिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी है।

