द लोकतंत्र : कड़ाके की ठंड और सर्द सुबह अक्सर मनुष्य के भीतर आलस्य को बढ़ावा देती है, जिसका सीधा प्रभाव न केवल उसकी कार्यक्षमता पर, अपितु मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वृंदावन के प्रतिष्ठित संत और राधारानी के अनन्य भक्त प्रेमानंद जी महाराज ने हाल ही में एक वायरल वीडियो में सर्दियों में देर तक सोने की आदत को आध्यात्मिक और व्यावहारिक स्तर पर घातक बताया है। महाराज जी के अनुसार, ब्रह्ममुहूर्त का त्याग करना मनुष्य को उसके मूल स्वभाव से दूर कर नकारात्मकता की ओर धकेलता है।
बुरे सपनों का मनोविज्ञान: अति-निद्रा का दुष्प्रभाव
सत्संग के दौरान एक महिला की जिज्ञासा का समाधान करते हुए महाराज जी ने देर तक सोने और नकारात्मक स्वप्नों के बीच के संबंध को स्पष्ट किया।
- अल्प किंतु सघन निद्रा: प्रेमानंद महाराज ने तर्क दिया कि जो व्यक्ति अनुशासित जीवन जीते हैं और मात्र 5 घंटे की गहरी नींद लेते हैं, उन्हें व्यर्थ के सपने विचलित नहीं करते। देर तक बिस्तर पर पड़े रहने से मन भ्रमित होता है और अशुद्ध विचार स्वप्न बनकर उभरते हैं।
- पशुता बनाम मनुष्यता: महाराज ने कठोर शब्दों में कहा कि रात को अनावश्यक देर तक जागना और सूर्योदय के बाद तक सोते रहना मनुष्य को पशुवत बना देता है। ब्रह्ममुहूर्त में जागरण ही वह सीमा रेखा है जो अध्यात्म और धर्म की समझ विकसित करती है।
नाम-जप की दिव्य शक्ति: एक माह का अभ्यास
आदत बदलने के लिए महाराज जी ने एक व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त किया है।
- ब्रह्ममुहूर्त में भ्रमण: सुबह उठते ही ईश्वर का नाम-जप करते हुए टहलना तन और मन दोनों को ऊर्जावान बनाता है। यह प्रक्रिया मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न करती है।
- चरित्र की पवित्रता: नाम-जप तभी फलदायी होता है जब व्यक्ति का आचरण शुद्ध हो। महाराज जी का स्पष्ट मत है कि बिना पवित्र चरित्र के की गई कोई भी साधना सांसारिक या आध्यात्मिक उन्नति प्रदान नहीं कर सकती। 30 दिनों का निरंतर अभ्यास किसी भी कठिन आदत को स्थायी बना सकता है।
निष्कर्षतः, सर्दियों का आलस्य मात्र शारीरिक नहीं, बल्कि एक मानसिक बाधा है। ब्रह्ममुहूर्त में जागरण और नाम-जप न केवल दिन को सफल बनाते हैं, बल्कि आत्मा को भी शुद्ध करते हैं। महाराज जी का संदेश साफ़ है— उन्नति का मार्ग अनुशासन और भक्ति से होकर गुजरता है।

