द लोकतंत्र : भारतीय सांस्कृतिक एवं धार्मिक कैलेंडर में माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को ‘सकट चौथ’ के रूप में विशेष महत्व दिया गया है। वर्ष 2026 में यह पर्व 6 जनवरी को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह व्रत न केवल संतान की दीर्घायु और कल्याण के लिए किया जाता है, अपितु यह मनुष्य के जीवन में आने वाले कठिन संकटों के निवारण का भी एक अचूक माध्यम है। कड़ाके की ठंड के बीच संयम और तपस्या के साथ किया गया यह अनुष्ठान साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
शास्त्रीय महत्व: विघ्नहर्ता की साधना एवं प्रभाव
भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। सकट चौथ के दिन उनकी उपासना स्थिरता और धैर्य का प्रतीक है।
- संकट निवारण का विज्ञान: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चतुर्थी तिथि के स्वामी गणेश जी हैं। इस दिन गणेश अथर्वशीर्ष या गणेश मंत्रों का जाप करने से कुंडली के बुध और चंद्रमा दोषों का शमन होता है, जिससे मानसिक संतुलन और कार्य सिद्धि प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक लाभ: निर्जल अथवा फलाहार व्रत से शरीर का विषहरण (Detoxification) होता है और ब्रह्ममुहूर्त में की गई साधना एकाग्रता को चरम पर ले जाती है।
पूजा विधान: शुद्धि से समृद्धि तक का सफर
सकट चौथ की पूजा में शुचिता एवं एकाग्रता का अत्यंत महत्व है। विधिपूर्वक किए गए अनुष्ठान ही पूर्ण फलदायी होते हैं।
- ब्रह्ममुहूर्त जागरण: सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना सात्विक ऊर्जा को आकर्षित करता है।
- कलश स्थापना एवं अभिषेक: गणेश जी की प्रतिमा को जल तथा पंचामृत से स्नान कराकर दूर्वा अर्पित करें। मान्यता है कि 21 दूर्वा की गांठें चढ़ाने से 21 तरह के दुखों का अंत होता है।
- चंद्रदर्शन का महत्व: यह व्रत रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही पूर्ण माना जाता है।
भोग एवं प्रसाद: तिल-गुड़ का आयुर्वेदिक व धार्मिक पक्ष
माघ मास की शीत ऋतु में तिल और गुड़ का सेवन न केवल धार्मिक बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी उत्तम है।
- भगवान गणेश को तिल से बने व्यंजन, मोदक और लड्डू अत्यधिक प्रिय हैं। तिल को अक्षय पुण्य प्रदान करने वाली वस्तु माना गया है। इस दिन तिल-कुटा का भोग लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और पारिवारिक समृद्धि सुनिश्चित होती है।
निष्कर्षतः, सकट चौथ का व्रत भारतीय जनमानस में अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि कठिन स्थितियों में भी धैर्य और भक्ति के साथ कैसे विजय प्राप्त की जा सकती है। 6 जनवरी 2026 को विघ्नहर्ता की यह उपासना निश्चित रूप से भक्तों के जीवन में नव-ऊर्जा का संचार करेगी।

