द लोकतंत्र : वर्तमान समय में वैवाहिक और पारिवारिक विवादों में कानूनी प्रावधानों के बढ़ते उपयोग और उनके कथित दुरुपयोग को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक चिंता देखी जा रही है। इसी कड़ी में, वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज के साथ एक भक्त की चर्चा का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। भक्त ने आधुनिक समय में महिलाओं द्वारा कानून का गलत लाभ उठाकर पुरुषों और उनके परिवारों के आर्थिक व मानसिक शोषण पर महाराज से मार्गदर्शन मांगा। प्रेमानंद महाराज ने इस जटिल सामाजिक समस्या पर न केवल कानूनी ऐतिहासिकता का बोध कराया, बल्कि ‘कर्मफल’ और ‘ईश्वरीय न्याय’ के सिद्धांतों के माध्यम से एक कठोर चेतावनी भी दी है।
कानून का उद्भव: दमन से सुरक्षा तक का सफर
प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट किया कि कोई भी कानून अकारण अस्तित्व में नहीं आता। उन्होंने समाज को अतीत की उन कड़वी सच्चाइयों का स्मरण कराया, जिसके कारण सुरक्षात्मक कानूनों की आवश्यकता पड़ी।
- अत्याचार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: महाराज ने उल्लेख किया कि एक समय समाज में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। विवाह के उपरांत उन्हें ‘दासी’ समझना, उनके साथ अमानवीय व्यवहार और शारीरिक हिंसा एक सामान्य कृत्य माना जाने लगा था। इन्हीं अत्याचारों को रोकने और नारी को सम्मानजनक जीवन प्रदान करने हेतु वर्तमान कठोर कानूनों का निर्माण हुआ।
- रक्षा बनाम शोषण: संत ने बल देकर कहा कि ये कानून ‘रक्षा कवच’ (Protective Shield) के रूप में बनाए गए थे, न कि किसी निर्दोष परिवार को प्रताड़ित करने या धन उगाही करने के शस्त्र के रूप में।
नैतिक पतन और कर्मफल का सिद्धांत
भक्त द्वारा उठाए गए ‘कानून के दुरुपयोग’ और ‘परिवारों के शोषण’ के मुद्दे पर महाराज ने ‘अज्ञानता’ और ‘धर्म के अभाव’ को मुख्य कारण बताया।
- मर्यादा का उल्लंघन: प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जो लोग कानून का दुरुपयोग कर दूसरों का धन लूटते हैं या मानसिक संताप देते हैं, वे वास्तव में ‘धर्म और मर्यादा’ के ज्ञान से शून्य हैं। अज्ञानवश वे इसे अपनी जीत मान सकते हैं, किंतु आध्यात्मिक स्तर पर यह उनके विनाश का कारण है।
- ईश्वरीय न्याय (Divine Justice): महाराज ने एक चौंकाने वाला और गंभीर पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मानवीय न्यायालय से कोई व्यक्ति बच सकता है, साक्ष्य मिटा सकता है, किंतु ईश्वर के न्याय की प्रक्रिया सूक्ष्म और अचूक है। जो कष्ट आज दूसरों को दिया जा रहा है, उसे भविष्य में स्वयं भोगना ही पड़ेगा।
भविष्य का सामाजिक प्रभाव और विशेषज्ञों की राय
- समाजशास्त्रियों का मानना है कि प्रेमानंद महाराज जैसे प्रभावशाली आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का यह संदेश कानूनी साक्षरता और नैतिक शिक्षा के बीच की खाई को पाटने का कार्य करेगा। वर्ष 2026 में, जब पारिवारिक न्यायालयों में ‘मिथ्या अभियोगों’ (False Accusations) की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है, तब ‘ईश्वरीय दंड’ और ‘कर्मफल’ का यह भय सामाजिक सुधार की दिशा में एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक नियंत्रण सिद्ध हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब तक समाज में आंतरिक नैतिकता का विकास नहीं होगा, तब तक कानूनों का निष्पक्ष क्रियान्वयन एक चुनौती बना रहेगा।
निष्कर्षतः, प्रेमानंद महाराज का यह वक्तव्य समाज के दोनों पक्षों—पुरुष और महिला—के लिए एक दर्पण है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि शोषण चाहे पुरुष का हो या महिला का, दोनों ही अधर्म की श्रेणी में आते हैं। कानून को शस्त्र बनाकर किसी निर्दोष का जीवन नष्ट करना स्वयं के परलोक को बिगाड़ने जैसा है। यह समय केवल अधिकारों की मांग का नहीं, बल्कि मर्यादाओं के पालन का भी है।

