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बॉलीवुड की सबसे बदकिस्मत फिल्म! 1963 में शुरू हुई, 1986 में हुई रिलीज; हीरो से लेकर डायरेक्टर तक की हो गई मौत

The loktnatra

द लोकतंत्र : एक फिल्म को बनाने में आमतौर पर एक या दो साल का समय लगता है। लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी फिल्म भी है जिसे बनाने में 10 या 20 साल नहीं, बल्कि पूरे 23 साल लग गए। यह कहानी है मशहूर डायरेक्टर के. आसिफ की फिल्म ‘लव एंड गॉड’ (Love And God) की। इस फिल्म के बनने की कहानी किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं है, क्योंकि इसे पूरा करने के चक्कर में फिल्म के दो लीड हीरो और खुद डायरेक्टर की भी जान चली गई।

गुरु दत्त के साथ हुई थी शुरुआत

फिल्म ‘लव एंड गॉड’ लैला-मजनू की अमर प्रेम कहानी पर आधारित थी। महान फिल्मकार के. आसिफ (जिन्होंने ‘मुगल-ए-आजम’ बनाई थी) ने इस फिल्म का काम साल 1963 में शुरू किया था। उस वक्त लीड रोल के लिए दिग्गज अभिनेता गुरु दत्त को चुना गया था। फिल्म की शूटिंग शुरू ही हुई थी कि अगले साल यानी 1964 में गुरु दत्त की अचानक मौत हो गई। हीरो की मौत के बाद फिल्म का काम बीच में ही रुक गया।

संजीव कुमार के साथ फिर शुरू हुआ सफर

गुरु दत्त के निधन के कुछ साल बाद, के. आसिफ ने फिल्म को दोबारा शुरू करने का फैसला किया। इस बार उन्होंने मजनू के किरदार के लिए संजीव कुमार को चुना। साल 1970 में फिल्म की शूटिंग फिर से शुरू हुई। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 9 मार्च 1971 को खुद डायरेक्टर के. आसिफ का निधन हो गया। उस समय तक फिल्म का क्लाइमैक्स (आखिरी हिस्सा) शूट नहीं हो पाया था, और फिल्म एक बार फिर डिब्बे में बंद हो गई।

पत्नी ने पूरा किया पति का वादा

के. आसिफ की मौत के बाद करीब 15 साल बीत गए। हर किसी को लगा कि अब यह फिल्म कभी नहीं बन पाएगी। लेकिन के. आसिफ की पत्नी अख्तर आसिफ ने अपने पति का अधूरा सपना पूरा करने की ठानी। उन्होंने प्रोड्यूसर के. सी. बोकाडिया की मदद ली। अख्तर आसिफ ने तीन अलग-अलग स्टूडियो के चक्कर काटे और फिल्म के बिखरे हुए हिस्सों को इकट्ठा किया।

काफी मेहनत के बाद अधूरी कड़ियों को जोड़ा गया और साल 1986 में फाइनली फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज किया गया। हालांकि, दुख की बात यह रही कि फिल्म की रिलीज से ठीक एक साल पहले, यानी 1985 में इसके दूसरे हीरो संजीव कुमार का भी निधन हो गया था।

अधूरा रह गया ‘मुगल-ए-आजम’ जैसा जादू

‘लव एंड गॉड’ के. आसिफ की एकमात्र कलर फिल्म थी। उन्होंने इसे ‘मुगल-ए-आजम’ की तरह ही भव्य बनाने की कोशिश की थी। लेकिन बार-बार हीरो बदलने और तकनीकी दिक्कतों के कारण फिल्म वैसी नहीं बन पाई जैसी उन्होंने सोची थी। फिर भी, यह फिल्म सिनेमा के इतिहास में उस जुनून और वादे के लिए याद की जाती है, जिसे पूरा करने के लिए एक महिला ने 23 साल तक हार नहीं मानी।

Uma Pathak

Uma Pathak

About Author

उमा पाठक ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में स्नातक और बीएचयू से हिन्दी पत्रकारिता में परास्नातक किया है। पाँच वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाली उमा ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं। उमा पत्रकारिता में गहराई और निष्पक्षता के लिए जानी जाती हैं।

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