द लोकतंत्र : सूर्य देव अब धनु राशि से विदा लेकर मकर राशि में प्रवेश कर चुके हैं और इसके साथ ही शुरू हो चुका है ‘उत्तरायण’ का पावन समय। इस साल तिथियों के फेर की वजह से 14 और 15 जनवरी, दोनों ही दिन मकर संक्रांति की धूम देखने को मिल रही है।
देश के अलग-अलग कोनों में इसे पोंगल, बिहू, उत्तरायण या खिचड़ी के नाम से मनाया जाता है। लेकिन एक चीज़ जो उत्तर भारत में सबसे कॉमन है, वो है— खिचड़ी। अक्सर हमारी युवा पीढ़ी यानी ‘जेन-जी’ (Gen Z) के मन में यह सवाल आता है कि इतने बड़े त्योहार पर हम बिरयानी या पुलाव के बजाय सादी सी दिखने वाली खिचड़ी क्यों बनाते हैं? आइए जानते हैं इसके पीछे का दिलचस्प किस्सा।
बाबा गोरखनाथ से जुड़ा है इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने की शुरुआत बाबा गोरखनाथ के समय से हुई थी। कहा जाता है कि खिलजी के आक्रमण के दौरान साधु-संतों को भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था और वे अक्सर भूखे रह जाते थे, जिससे वे शारीरिक रूप से कमजोर होने लगे थे।
इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाकर एक नया व्यंजन तैयार किया। यह डिश बनाने में बहुत आसान थी, जल्दी पक जाती थी और खाने में पौष्टिक भी थी। साधुओं को यह खूब पसंद आई और उन्हें इससे काफी ताकत मिली। बाबा गोरखनाथ ने इस भोजन का नाम ‘खिचड़ी’ रखा। तभी से मकर संक्रांति पर इसे प्रसाद के रूप में बनाने की परंपरा शुरू हो गई।
ग्रहों की शांति और दान का महत्व
ज्योतिष के नजरिए से देखें तो खिचड़ी का संबंध ग्रहों से भी है। माना जाता है कि खिचड़ी में इस्तेमाल होने वाले चावल का संबंध चंद्रमा से, दाल का शनि से और हल्दी का गुरु ग्रह से होता है। संक्रांति पर इसे बनाकर खाने और दान करने से कुंडली के ग्रह दोष शांत होते हैं। मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान करना महादान माना जाता है, जिससे जीवन में सुख-शांति आती है।
सेहत के लिए क्यों है बेस्ट?
मकर संक्रांति कड़ाके की ठंड के बीच आती है। इस मौसम में हमारा पाचन तंत्र थोड़ा धीमा हो जाता है। ऐसे में खिचड़ी एक ‘सुपरफूड’ की तरह काम करती है।
- पचने में आसान: दाल-चावल का मेल शरीर को भरपूर प्रोटीन और ऊर्जा देता है।
- गर्मी का अहसास: खिचड़ी में डाला गया देसी घी शरीर को अंदर से गर्म रखता है और इम्युनिटी बढ़ाता है।
- हल्का भोजन: त्योहारों पर भारी खाना खाने के बजाय खिचड़ी पेट को आराम देती है।
तो इस बार जब आप मकर संक्रांति पर गरम-गरम खिचड़ी का आनंद लें, तो याद रखिएगा कि आप सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा बन रहे हैं।

