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पार्थ सारथी की पहली पुण्यतिथि: पिता राबी शुक्ला बोले – यह दिन श्रद्धांजलि का नहीं उत्तरदायित्व निभाने का है

Parthasarathy's first death anniversary: ​​Father Rabi Shukla said - This day is not for paying tribute, but for fulfilling our responsibilities.

द लोकतंत्र/ देवरिया : कुछ दुख ऐसे होते हैं, जिन पर समय भी मरहम नहीं लगाता। आज पार्थ सारथी शुक्ला की पहली पुण्यतिथि है और आज की तारीख़ यह एक बोझिल सुबह बनकर आई है, जिसमें हवा भी धीमी है और समय भी। ऐसा लगता है जैसे दिन ने खुद को रोक लिया हो, ताकि हम फिर से याद कर सकें पार्थ को जिसकी उपस्थिति उन तमाम लोगों की उम्मीद थी जो कमजोर थे, बेबस थे, लाचार थे।

यह दिन फिर से वही सवाल लेकर सामने खड़ा है कि क्या सच में कुछ लोग कभी जाते हैं? बीते एक साल में समय आगे बढ़ा, मौसम बदले, ख़बरें बदलीं, लेकिन पार्थ की अनुपस्थिति का एहसास कहीं कम नहीं हुआ। ऐसा लगता है जैसे वह अचानक उठकर कह देगा कि ‘सब ठीक है।’ लेकिन न चाहते हुए भी हम सच को झुठला नहीं सकते और सच यही है कि कुछ सन्नाटे जीवन में स्थायी हो जाते हैं।

पार्थ का नहीं होना अब भी यकीन नहीं देता

पार्थ अब इस दुनिया में नहीं रहा। आज भी यह वाक्य पूरा लिखते हुए उंगलियां रुक जाती हैं, दिल भारी हो जाता है और आंखें खुद-ब-खुद नम हो जाती हैं। आज सुबह राबी शुक्ला अंकल ने सूचना दी थी कि आज पार्थ की पुण्य स्मृति में उसके सेवा कार्यों को आगे बढ़ाते हुए गरीब, लाचार और असहाय जनों की सेवा की जाएगी और ज़रूरतमंद लोगों को भोजन वितरित किया जायेगा। दो-तीन बार कोशिश की कि सूचना को ख़बर की शक्ल देकर पार्थ को श्रद्धांजलि अर्पित करूँ लेकिन शब्द शायद साथ देने को इनकार कर रहे थे।

कभी-कभी दुख इतना गहरा होता है कि शब्द अर्थ खो देते हैं। और आज पुनः वही स्थिति है जो एक साल पहले पार्थ के निधन की ख़बर अपडेट करते वक़्त थी। बीते साल की वह सुबह आज भी आँखों के सामने ताज़ा है, जब यह ख़बर आई कि पार्थ अब हमारे बीच नहीं रहा। दरअसल कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी हवा में घुली रहती है और पार्थ भी उन्हीं में से एक था।

एक साल बाद भी वही खालीपन, वही कसक

पार्थ एक ऐसी शख़्सियत थे जिनकी मौजूदगी चुपचाप बहुत कुछ बदल देती थी। आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर जब लोग उन्हें याद कर रहे हैं, तो आंखों के सामने सिर्फ एक तस्वीर नहीं आती बल्कि वह पूरा सफर याद आता है, जिसमें पार्थ हमेशा दूसरों के लिए आगे खड़े दिखे। महामारी के कठिन दौर में, जब लोग अपने-अपने डर में सिमट गए थे, पार्थ सड़कों पर थे। किसी के लिए भोजन लेकर, किसी के लिए दवा, किसी के लिए सिर्फ भरोसे के दो शब्द। वह मदद करते वक्त कभी कैमरा नहीं ढूंढते थे, न ही तारीफ की उम्मीद रखते थे। शायद इसी वजह से उनका जाना आज भी इतना खालीपन छोड़ गया है।

पार्थ ने कभी अपने काम को प्रचार नहीं बनाया, न ही अपने नाम की तख्तियां लगाईं। शायद इसी कारण आज उनका जाना इतना भारी लगता है। क्योंकि जो अपने लिए कम और दूसरों के लिए ज़्यादा जीते हैं, वही सबसे गहरी जगह छोड़ जाते हैं।

पिता का मौन प्रण: बेटे को कर्मों में जीवित रखना

पार्थ की पुण्यतिथि पर बेटे को याद करते हुए पिता राबी शुक्ला भावुक दिखे और बेटे के अधूरे सपनों को अपने हाथों से आगे बढ़ाते हुए नम आंखों के साथ उन्होंने पार्थ की स्मृति में गरीब और बेसहारा लोगों को कंबल वितरित किए, ज़रूरतमंदों को भोजन के पैकेट दिए। आज पार्थ की पुण्यतिथि पर सबसे गहरी तस्वीर एक पिता की है। राबी शुक्ला, जो बेटे को याद करते हुए टूटे नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ा रहे हैं। यह एक पिता का मौन प्रण था कि बेटा चला गया, लेकिन उसका रास्ता नहीं रुकेगा।

आज, देवरिया के सिविल लाइंस स्थित आवास पर पार्थ को नम आँखो से श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पार्थ की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा केवल श्रद्धांजलि नहीं थी बल्कि उस जिम्मेदारी और सेवा का विस्तार थी, जिसे पार्थ जीवन पर्यंत निभाते रहे। पिता ने बेटे की याद को आंसुओं तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे कर्म में बदल दिया। इस मौक़े पर परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, मित्रों और शुभचिन्तकों ने पार्थ को श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें सजल नेत्रों से याद किया।

Team The Loktantra

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