द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी श्रद्धालुओं को प्रवेश देने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ रुख अपनाते हुए इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने दो टूक कहा कि महाकाल के परिसर में कोई वीआईपी नहीं होता, लेकिन इस तरह की याचिकाएं दाखिल करना भी उचित नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि याचिकाकर्ता का उद्देश्य श्रद्धा से अधिक कुछ और प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि मंदिर में किसे प्रवेश दिया जाए, यह तय करना न्यायालय का कार्यक्षेत्र नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि यदि कोई आपत्ति है तो वह मंदिर प्रशासन के समक्ष ज्ञापन प्रस्तुत करे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली।
हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने पहुंचा था मामला
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिका में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि महाकाल मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश की अनुमति देना मंदिर प्रशासन और जिला अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करता है। याचिकाकर्ता दर्पण सिंह अवस्थी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
या सबको मिले अधिकार, या किसी को नहीं
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर स्पष्ट और समान दिशा-निर्देश होने चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी व्यक्ति को कलेक्टर की सिफारिश पर गर्भगृह में जाने की अनुमति दी जाती है, तो आम श्रद्धालू को भी भगवान पर जल चढ़ाने का वही अधिकार मिलना चाहिए। उनका कहना था कि या तो सभी को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दी जाए, या फिर किसी को भी नहीं नियम सबके लिए समान हों।
कोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप से इनकार
दलीलें सुनने के बाद CJI सूर्यकांत ने कहा कि अगर कोर्ट यह तय करने लगे कि कौन गर्भगृह में जाएगा और कौन नहीं, तो यह न्यायपालिका के लिए अत्यधिक बोझिल हो जाएगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि गर्भगृह में अनुच्छेद 14 लागू करने की बात मानी गई, तो भविष्य में लोग अनुच्छेद 19 जैसे अन्य मौलिक अधिकारों का भी दावा करने लगेंगे जैसे मंत्र जाप या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
CJI ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं दाखिल करने वाले लोग श्रद्धालु कम और किसी अन्य उद्देश्य से प्रेरित अधिक लगते हैं। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद साफ हो गया कि महाकाल मंदिर में गर्भगृह प्रवेश का फैसला अदालत नहीं, बल्कि मंदिर प्रशासन और परंपराओं के अनुसार ही होगा।

