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बिहार चुनाव सुप्रीम कोर्ट पहुंचा: जनसुराज की याचिका में महिला रोजगार योजना पर सवाल, दोबारा चुनाव की मांग

Bihar elections reach Supreme Court: Jan Suraj party's petition questions women's employment scheme, demands fresh elections.

द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज ने हाल ही में संपन्न बिहार चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए रिट याचिका दायर की है, जिसमें विशेष रूप से बिहार सरकार की ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ को चुनौती दी गई है। जनसुराज का दावा है कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं के खातों में सीधे 10-10 हजार रुपये ट्रांसफर किए गए, जिससे चुनाव प्रभावित होने की आशंका पैदा होती है।

चुनाव के दौरान 25 से 35 लाख महिलाओं को आर्थिक लाभ देने का आरोप

याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार ने न केवल लगभग 25 से 35 लाख महिलाओं को आर्थिक लाभ दिया, बल्कि चुनाव अवधि के दौरान नए लाभार्थियों को भी योजना से जोड़ा। जनसुराज के अनुसार, यह कदम निष्पक्ष चुनाव की भावना के विपरीत है और इसे गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह सत्ताधारी दलों द्वारा चुनाव से ठीक पहले घोषित की जाने वाली मुफ्त और कल्याणकारी योजनाओं पर स्पष्ट समयसीमा तय करे। याचिका में सुझाव दिया गया है कि ऐसी योजनाओं की घोषणा कम से कम छह महीने पहले ही कर दी जानी चाहिए, ताकि उनका चुनावी फायदा न उठाया जा सके।

बिहार में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को संपन्न हुए थे, जबकि 14 नवंबर को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए गए। जनसुराज ने अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि आचार संहिता के दौरान धनराशि का वितरण संविधान के कई प्रावधानों—जैसे अनुच्छेद 14, 21, 112, 202 और 324 का उल्लंघन करता है। पार्टी ने यह भी मांग की है कि चुनाव आयोग को आर्टिकल 324 और रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट की धारा 123 के तहत आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया जाए।

याचिका में कई गंभीर आरोप

मामले की सुनवाई देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ द्वारा किए जाने की संभावना है। इस सुनवाई पर राजनीतिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर भविष्य में चुनावी घोषणाओं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर पड़ सकता है।

याचिका में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है कि स्वयं सहायता समूह ‘जीविका’ से जुड़ी करीब 1.8 लाख महिला लाभार्थियों को चुनाव के दोनों चरणों में पोलिंग बूथ पर तैनात किया गया, जो चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। जनसुराज ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व आदेश का हवाला देते हुए मांग की है कि पूरे चुनाव की प्रक्रिया की समीक्षा कराई जाए और जरूरत पड़ने पर दोबारा चुनाव कराने पर भी विचार किया जाए।

डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) और मुफ्त योजनाओं को लेकर दिशानिर्देश देने की मांग

इसके साथ ही पार्टी ने चुनाव आयोग से डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) और मुफ्त योजनाओं को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करने की मांग की है, ताकि भविष्य में किसी भी सरकार पर मतदाताओं को प्रभावित करने के आरोप न लगें। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना 26 सितंबर 2025 को शुरू की गई थी, जिसके तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता देने का लक्ष्य रखा गया था।

यह मामला अब केवल एक राज्य के चुनाव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देशभर में चुनावी पारदर्शिता, सरकारी योजनाओं की समय-सीमा और मतदाता प्रभावित होने जैसे बड़े सवालों को भी सामने ला रहा है। सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि चुनावी प्रक्रिया को और अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए भविष्य में किन मानकों का पालन किया जाएगा।

यह भी पढ़ें : चाइनीज मांझे पर योगी सरकार का सख्त वार: ‘पतंग उड़ाने वाले हत्यारे’ पर होगी कठोर कार्रवाई, मौत को माना जाएगा हत्या

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