द लोकतंत्र/ लाइफस्टाइल : सफलता, आत्मविश्वास और उपलब्धियां जहां जीवन में खुशियां लाती हैं, वहीं कई बार मानसिक दबाव भी बढ़ा देती हैं। सामाजिक तुलना, अपेक्षाएं और जिम्मेदारियां व्यक्ति के भीतर अदृश्य तनाव (मेंटेनेंस इंसोम्निया) पैदा कर सकती हैं। हिंदू मान्यताओं में शनि की साढ़ेसाती को कर्म और धैर्य की परीक्षा का समय माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जीवन में बदलाव और दबाव का सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य और नींद पर पड़ता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार आजकल बड़ी संख्या में लोग “मेंटेनेंस इंसोम्निया” यानी रात में बार-बार नींद खुलने की समस्या से जूझ रहे हैं। हेल्थ संस्था Mayo Clinic के मुताबिक यह समस्या अक्सर तनाव और चिंता से जुड़ी होती है। जब दिमाग लगातार सतर्क अवस्था में रहता है, तो शरीर गहरी और आरामदायक नींद में प्रवेश नहीं कर पाता। काम का दबाव, आर्थिक चिंता, पारिवारिक जिम्मेदारियां या स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां रात की नींद को प्रभावित कर सकती हैं।
तनाव बढ़ने पर शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो दिमाग को सक्रिय बनाए रखता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति हल्की सी आहट या असुविधा में भी जाग सकता है। कई बार पुराने अनुभव, बुरे सपने या “नींद नहीं आएगी” की चिंता भी अनिद्रा के चक्र को मजबूत कर देती है।
शारीरिक कारण, उम्र और वातावरण का प्रभाव
रात में नींद टूटने के पीछे सिर्फ मानसिक कारण ही नहीं, बल्कि शारीरिक समस्याएं भी जिम्मेदार हो सकती हैं। कमर दर्द, गठिया, नसों का दर्द, एसिड रिफ्लक्स, बार-बार पेशाब आना जैसी स्थितियां नींद में बाधा डालती हैं। उम्र बढ़ने के साथ नींद का पैटर्न स्वाभाविक रूप से हल्का हो जाता है, जिससे व्यक्ति बार-बार जाग सकता है।
महिलाओं में रजोनिवृत्ति के दौरान हार्मोनल बदलाव, विशेषकर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के उतार-चढ़ाव, नींद को प्रभावित करते हैं। हॉट फ्लैश और मूड स्विंग भी आरामदायक नींद में बाधा बन सकते हैं। सोने का वातावरण भी बेहद महत्वपूर्ण है। कमरे में ज्यादा रोशनी, बाहरी शोर, असुविधाजनक तापमान या इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन का उपयोग मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को कम कर देता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सोने से कम से कम 30 मिनट पहले मोबाइल और लैपटॉप से दूरी बना लें।
अनिद्रा से बचाव के उपाय
क्रॉनिक अनिद्रा के इलाज में “कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी फॉर इंसोम्निया (CBT-I)” प्रभावी मानी जाती है। यह थेरेपी नकारात्मक सोच को बदलने और स्वस्थ नींद की आदतें विकसित करने में मदद करती है। आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर सीमित अवधि के लिए दवाएं भी सुझा सकते हैं।
नियमित सोने-जागने का समय तय करना, शाम के बाद कैफीन से बचना, दिन में लंबी झपकी न लेना और गहरी सांस लेने जैसे रिलैक्सेशन अभ्यास अपनाना सर्कैडियन रिदम को संतुलित रखने में सहायक होते हैं। यदि नींद की समस्या लगातार बनी रहती है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है, क्योंकि अच्छी नींद ही अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की आधारशिला है।

