द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : अमेरिका की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of the United States द्वारा टैरिफ व्यवस्था को गैर-कानूनी ठहराने के कुछ ही घंटों बाद राष्ट्रपति Donald Trump ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया कि भारत के साथ हुए व्यापार समझौते में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि भारत पहले से तय दरों के अनुसार टैरिफ देता रहेगा, जबकि अमेरिका भारतीय सामानों पर टैरिफ नहीं लगाएगा।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी पक्ष ने भारतीय उत्पादों पर 18% की दर से शुल्क लगाने की बात कही थी, जो पहले लागू 50% टैरिफ से काफी कम है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राष्ट्रपति की व्यापक टैरिफ शक्तियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने 6-3 के बहुमत से माना कि 1977 के IEEPA कानून के तहत इतने बड़े पैमाने पर आयात शुल्क लगाना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इन घटनाक्रमों के बीच ट्रंप द्वारा 10% ग्लोबल टैरिफ लागू करने की घोषणा ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि भारत पर लागू शुल्क दर वास्तव में क्या होगी पहले से तय 18% या नया 10% ग्लोबल टैरिफ?
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर असर? 10% अस्थायी टैरिफ और कानूनी विकल्पों पर नजर
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब ट्रंप से पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारत-अमेरिका डील पर क्या असर होगा, तो उन्होंने कहा, ‘कुछ नहीं बदलेगा। वे टैरिफ देते रहेंगे और हम टैरिफ नहीं देंगे।’ उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi की तारीफ करते हुए कहा कि भारत के साथ अब ‘सही और संतुलित’ समझौता हुआ है।
हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आ रहा है कि जिन देशों के साथ अमेरिका ने व्यापार समझौते किए हैं, उन्हें फिलहाल 10% ग्लोबल टैरिफ का ही सामना करना पड़ सकता है। यदि ऐसा होता है, तो भारत पर भी इसका असर पड़ेगा, भले ही पहले उच्च दरों पर सहमति बनी हो। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि 10% टैरिफ अस्थायी प्रकृति का है। ट्रंप प्रशासन पहले से तय उच्च दरों को लागू करने के लिए अन्य कानूनी प्रावधानों जैसे 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 का सहारा ले सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में अनिश्चितता बनी रह सकती है। स्टील, ऑटो पार्ट्स, टेक्सटाइल और फार्मा जैसे सेक्टर विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि अदालत के फैसले और नए टैरिफ आदेशों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाता है।

