द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान तनाव के बीच एक अहम कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध समाप्ति के लिए 9 अप्रैल 2026 की संभावित समय-सीमा तय करने का संकेत दिया है। इसके साथ ही उन्होंने अगले पांच दिनों तक ईरान के ऊर्जा ठिकानों जैसे पावर प्लांट और संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले रोकने की घोषणा की है। इस कदम को तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप का दावा है कि दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत में कई अहम बिंदुओं पर सहमति बनती दिख रही है और करीब 15 मुद्दों पर प्रगति हुई है। हालांकि, अंतिम समझौता अभी बातचीत की दिशा और शर्तों पर निर्भर करेगा। शुरुआती दौर में ईरान ने सीधे संवाद से इनकार किया था, लेकिन बाद में अप्रत्यक्ष बातचीत की पुष्टि की गई, जिससे संकेत मिलता है कि बैक-चैनल डिप्लोमेसी सक्रिय है।
मध्यस्थ देशों की भूमिका, वैश्विक असर और भारत की चिंता
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्किए, मिस्र और पाकिस्तान जैसे देशों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से सामने आई जानकारी में बताया गया है कि व्हाइट हाउस के प्रतिनिधियों से इन देशों के दूतों की मुलाकातें हुई हैं, ताकि संभावित समझौते का रास्ता तैयार किया जा सके। वहीं, इस्लामाबाद में संभावित बैठक को लेकर भी कूटनीतिक हलचल तेज बताई जा रही है।
इस बीच, ईरान की ओर से अमेरिकी दावों पर सख्त प्रतिक्रिया आई है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने ट्रंप के बयानों को भ्रामक बताते हुए कहा कि ईरान पर दबाव बनाकर उसे झुकाया नहीं जा सकता। दूसरी ओर, ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया है और अब ईरान बातचीत के लिए गंभीर है।
वैश्विक स्तर पर इस संघर्ष का असर ऊर्जा बाजार और अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट दिख रहा है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। इसी संदर्भ में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी समकक्ष मार्को रुबियो से बातचीत की। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की स्थिति और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा की और संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई।
हालांकि, अमेरिका के ‘नो अटैक’ फैसले और 9 अप्रैल की संभावित समय-सीमा ने शांति की उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि बातचीत स्थायी समाधान की ओर बढ़ती है या तनाव फिर से बढ़ता है।

