द लोकतंत्र/नई दिल्ली :कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार, 21 अक्टूबर को Delhi High Court में तीखी सुनवाई हुई। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की बेंच ने दोनों नेताओं के आचरण और बार-बार कानून के उल्लंघन के आरोपों पर सवाल उठाए।
कोर्ट के रुख और वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने के सुझाव के बाद उनके वकीलों ने याचिकाएं वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया। अब दोनों नेता अपनी हिरासत के खिलाफ निचली अपीलीय अदालत का रुख कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि सौरभ दास और आशुतोष रांका ने 10 अक्टूबर को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरा था, लेकिन पुलिस के आरोपों के मुताबिक अगले ही दिन इसका उल्लंघन कर दिया गया।
पुलिस का कहना है कि 11 अक्टूबर को दोनों ने जंतर-मंतर पर अनधिकृत तरीके से प्रवेश किया और शांति भंग की। बाद में 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर सुरक्षा घेरा तोड़ने और बिना अनुमति प्रदर्शन करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया।
तो आप लोग जेन-जी नहीं हैं:Delhi High Court
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अभीक चिमनी ने जब दोनों की उम्र 27 और 31 वर्ष बताई, तो जस्टिस प्रसाद ने टिप्पणी की, “तो आप लोग जेन-जी नहीं हैं?” कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि शुरुआत में छात्रों और युवाओं के मुद्दों से शुरू हुआ विरोध अब ‘रेजीम चेंज’ और ‘बैलेट’ जैसे मुद्दों तक कैसे पहुंच गया। बेंच ने प्रदर्शनकारियों के उद्देश्य और उनकी गतिविधियों को समझने की जरूरत पर भी टिप्पणी की।
सौरभ दास और आशुतोष रांका को 14 अक्टूबर को गिरफ्तार किए जाने के बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) रितु राज ने 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो और दिनों के लिए बढ़ा दी थी। SEM के सामने जमानत की प्रक्रिया के दौरान जमानतदारों के दस्तावेजों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। एक जमानतदार की फोटो पहचान में कथित तौर पर विसंगति बताई गई, जबकि दूसरे के दस्तावेजों में माता-पिता के नाम जैसी जानकारी नहीं थी।
इसी आदेश को Delhi High Court में चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि SEM के पास हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं है और इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होता है। हालांकि, बुधवार की सुनवाई में हाईकोर्ट के रुख के बाद वकीलों ने याचिकाएं वापस लेने का फैसला किया।
नेहा बोरा ने भी Delhi High Court का दरवाजा खटखटाया
इसी घटनाक्रम से जुड़े एक अन्य मामले में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने भी Delhi High Courtमें याचिका दायर की है। उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीना की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी है। बोरा को 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था।
पुलिस का आरोप है कि उन्होंने बिना अनुमति सेंट्रल पार्क, कनॉट प्लेस में झंडा फहराया और प्रदर्शनकारियों को उकसाया। बोरा की ओर से अदालत में दलील दी गई है कि दिल्ली पुलिस शांतिपूर्ण असहमति और विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए BNSS की धारा 163—जो पुराने कानून की धारा 144 के समान प्रावधान है—का कथित तौर पर ‘प्रशासनिक शॉर्टकट’ के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
अब निचली अदालत में होगी कानूनी लड़ाई
CJP नेताओं की याचिकाएं वापस लिए जाने के साथ हाईकोर्ट में उनकी मौजूदा चुनौती समाप्त हो गई है। अब हिरासत के खिलाफ अगली कानूनी लड़ाई निचली अपीलीय अदालत में लड़ी जा सकती है। इस मामले में एक ओर प्रदर्शन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल है, तो दूसरी ओर पुलिस और प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। बुधवार की सुनवाई ने इसी टकराव को एक बार फिर अदालत के सामने ला दिया।
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