द लोकतंत्र : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल के महीनों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई गिरावट को लेकर बाजार की चिंताओं को खारिज किया है। एक हालिया साक्षात्कार में गवर्नर मल्होत्रा ने स्पष्ट किया कि रुपये का मौजूदा स्तर बीते दो दशकों के दीर्घकालिक रुझानों के पूर्णतः अनुरूप है। उनके अनुसार, मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे इतने सुदृढ़ हैं कि इस बदलाव से कोई व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका नगण्य है।
सांख्यिकीय तुलना: गिरावट असाधारण नहीं
गवर्नर ने रुपये के ऐतिहासिक अवमूल्यन के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया।
- वार्षिक औसत: मल्होत्रा ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में रुपया औसतन 3 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से कमजोर हुआ है, वहीं 20 वर्षों की अवधि में यह आंकड़ा 3.4 प्रतिशत रहा है। अतः वर्तमान गिरावट को असामान्य मानना तर्कसंगत नहीं होगा।
- बाजार शक्तियां: आरबीआई अब रुपये की कोई निश्चित कीमत निर्धारित करने के बजाय बाजार की शक्तियों को मूल्य निर्धारण की स्वतंत्रता दे रहा है। केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप केवल तब होता है जब बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी या अस्थिरता देखी जाती है।
रुपये पर दबाव के प्रमुख कारण
वर्ष 2025 में एशियाई मुद्राओं के बीच रुपये का प्रदर्शन कई वैश्विक कारकों से प्रभावित रहा है:
- डॉलर की मजबूती: वैश्विक बाजारों में अमेरिकी मुद्रा के बढ़ते वर्चस्व ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बनाया है।
- पूंजी निकासी: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय बाजार से मुनाफावसूली करके पूंजी निकालने से रुपये की तरलता प्रभावित हुई है।
- व्यापारिक अनिश्चितता: भारत और अमेरिका के बीच संभावित टैरिफ समझौतों को लेकर बनी अस्पष्टता ने भी दबाव बढ़ाया है।
सुरक्षा कवच: विदेशी मुद्रा भंडार और ऋण प्रबंधन
कमजोर रुपये के बावजूद भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति अत्यंत सुरक्षित मानी जा रही है।
- आयात क्षमता: भारत के पास वर्तमान में 11 महीनों के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है।
- ऋण कवरेज: देश का कुल विदेशी ऋण लगभग 750 अरब डॉलर है, जिसका 92 प्रतिशत हिस्सा (करीब 690 अरब डॉलर) विदेशी मुद्रा भंडार द्वारा सुरक्षित है। यह स्थिति किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके को सहने की क्षमता प्रदान करती है।
व्यापार घाटे में कमी: एक सकारात्मक संकेत
- नवंबर में सोना, तेल और कोयले के आयात में कमी के चलते व्यापार घाटा पांच महीने के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। अमेरिका को होने वाले निर्यात में हुई वृद्धि रुपये के लिए एक मजबूत सपोर्ट के रूप में कार्य कर रही है।
निष्कर्षतः, गवर्नर संजय मल्होत्रा का बयान बाजार में स्थिरता का संदेश देता है। रुपये की गिरावट को संकट के बजाय एक संरचनात्मक समायोजन के रूप में देखना चाहिए, जो भारत के निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाने में भी सहायक हो सकता है।

