द लोकतंत्र : बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले में 18 दिसंबर 2025 की रात घटित हुई हृदयविदारक घटना ने दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है। गारमेंट फैक्ट्री में कार्यरत हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को उग्र कट्टरपंथियों की भीड़ ने ‘मजहबी भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ के झूठे आरोप में न केवल मौत के घाट उतार दिया, बल्कि उनके शव को पेड़ से लटकाकर आग के हवाले कर दिया। स्थानीय पुलिस प्रशासन और आरएबी (RAB) की प्रारंभिक जांच में पुष्टि हुई है कि मृतक के विरुद्ध ईशनिंदा का कोई भी साक्ष्य नहीं मिला है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह सुनियोजित हिंसा थी।
घटनाक्रम: प्रशासनिक विफलता और फैक्ट्री प्रबंधन का संदिग्ध रवैय्या
18 दिसंबर की शाम पॉयनियर निटवेयर फैक्ट्री में जो कुछ हुआ, वह प्रशासनिक देरी और सुरक्षा चूक की पूरी कहानी कहता है।
- देरी से सूचना: फैक्ट्री के वरिष्ठ प्रबंधक साकिब महमूद ने स्वीकार किया कि हंगामा शाम 5 बजे शुरू हुआ था, किंतु पुलिस को रात 8 बजे सूचित किया गया। प्रबंधन का दावा है कि वे मामले को आंतरिक रूप से सुलझाने का प्रयास कर रहे थे। मयमनसिंह के एसपी मोहम्मद फरहाद हुसैन खान ने स्पष्ट कहा कि यदि समय पर कॉल किया जाता, तो दीपू की जान बचाई जा सकती थी।
- भीड़ का आतंक: रात 8:45 बजे भीड़ फैक्ट्री के दरवाजे तोड़कर अंदर घुस गई। सुरक्षा कक्ष से दीपू को जबरन बाहर निकालकर HIGHWAY की ओर ले जाया गया। अत्यधिक ट्रैफिक जाम के कारण पुलिस बल समय पर घटनास्थल तक नहीं पहुंच सका।
जांच में खुलासा: बेगुनाह था दीपू चंद्र दास
आरएबी-14 के कमांडर मोहम्मद शम्सुज्जमां के बयान ने इस पूरी भीड़भाड़ वाली हिंसा के आधार को झूठा सिद्ध कर दिया है।
जांच के मुख्य बिंदु:
सोशल मीडिया पर कोई आपत्तिजनक पोस्ट नहीं: हैकर्स या कट्टरपंथियों द्वारा फैलाई गई अफवाह का कोई तकनीकी प्रमाण नहीं मिला।
- नकली इस्तीफा: भीड़ को शांत करने के लिए फैक्ट्री प्रबंधन ने दीपू से एक दिखावटी त्यागपत्र लिखवाया, जो बाद में विफल रहा।
- सुरक्षा का बलिदान: आरोप है कि फैक्ट्री की संपत्ति बचाने के लिए निर्दोष युवक को भीड़ के हवाले कर दिया गया, हालांकि मैनेजमेंट इससे इनकार करता है।
कानूनी कार्रवाई और भविष्य का संकेत
- मृतक के भाई अपू चंद्र दास की शिकायत पर भालुका पुलिस स्टेशन में 150 अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। अब तक 12 आरोपियों को हिरासत में लिया गया है। मानवाधिकार संगठनों का तर्क है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा में दंडमुक्ति (Impunity) की संस्कृति ऐसे अपराधों को बढ़ावा दे रही है।
निष्कर्षतः, दीपू दास की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि बांग्लादेश की कानून-व्यवस्था पर एक गहरा धब्बा है। अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब वर्तमान सरकार के न्यायिक कदमों पर टिकी हैं।

