द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : हिंदी साहित्य में एक विचारोत्तेजक और संवेदनशील कृति ‘कृष्ण का अंतर्द्वंद्व’ का हाल ही में औपचारिक विमोचन किया गया। लेखक सचिन पांडेय की यह पुस्तक किसी परंपरागत धार्मिक या ऐतिहासिक आख्यान की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक और आत्मिक संवाद का दस्तावेज़ है। यह पुस्तक भगवान कृष्ण को केवल एक पूज्य देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, संघर्षरत और प्रश्नों से जूझते चेतन व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती है, जो आज के समय और समाज से सीधे संवाद करता है।
इतिहास से परे, चेतना की यात्रा
‘कृष्ण का अंतर्द्वंद्व’ का मूल स्वर इतिहास के पन्नों में दबे किसी प्रसंग को दोहराना नहीं है, बल्कि उस मौन पीड़ा को शब्द देना है, जिसे सदियों से अनदेखा किया गया। पुस्तक के शुरुआती पृष्ठों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक का उद्देश्य न तो विवाद खड़ा करना है और न ही किसी न्यायिक या राजनीतिक बहस में प्रवेश करना। यह कृति मथुरा की उस स्मृति, उस वेदना और उस अधूरी चेतना का साहित्यिक रूपांतरण है, जिसे लेखक ‘अनवरत प्रतीक्षा’ और ‘सामूहिक मौन’ के रूप में रेखांकित करते हैं।
लेखक सचिन पांडेय स्वयं इस पुस्तक को अपनी नहीं, बल्कि ‘कृष्ण की वाणी और मथुरा की पुकार’ बताते हैं। उनके अनुसार वे केवल एक माध्यम हैं, एक कलम, जिसके जरिए यह कथा स्वयं को अभिव्यक्त करती है। यही भाव इस पुस्तक को विशिष्ट बनाता है साथ ही यह आत्मकथ्य नहीं, बल्कि आत्मबोध की यात्रा है। कृष्ण यहाँ रणभूमि के नायक या गीता के उपदेशक भर नहीं हैं, बल्कि वे उस भूमि के पुत्र हैं, जिसकी पहचान, सम्मान और अस्तित्व बार-बार प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया गया।
एक पुस्तक नहीं, एक वैचारिक हस्तक्षेप
पुस्तक के अध्याय मथुरा के सांस्कृतिक वैभव, कंस के अत्याचार, धर्म और सत्ता के टकराव, और अंततः आधुनिक भारत से संवाद तक फैले हुए हैं। हर अध्याय पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या इतिहास केवल अतीत की कथा है, या वह वर्तमान की जिम्मेदारी भी है। लेखक का आग्रह स्पष्ट है- यह पुस्तक उत्तर नहीं देती, बल्कि भीतर सवाल जगाती है। और शायद यही इसका सबसे बड़ा साहित्यिक गुण है।
‘कृष्ण का अंतर्द्वंद्व’ उन पाठकों के लिए है जो आस्था और विवेक के बीच संतुलन खोजते हैं, जो इतिहास को सिर्फ पढ़ना नहीं, महसूस करना चाहते हैं। विमोचन के साथ ही यह पुस्तक एक गंभीर वैचारिक बहस का आधार बनती दिख रही है। ऐसी बहस, जो शोर नहीं करती, बल्कि मौन को तोड़ती है। हिंदी साहित्य में यह कृति निस्संदेह एक संवेदनशील, साहसी और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप के रूप में दर्ज की जाएगी।

