द लोकतंत्र : मानव शरीर में लिवर (यकृत) एक बहुआयामी अंग है, जो रक्त के शुद्धिकरण, प्रोटीन संश्लेषण और ऊर्जा संग्रहण जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का संचालन करता है। किंतु, बदलती जीवनशैली और अस्वास्थ्यकर आदतों के कारण लिवर कैंसर के मामलों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब लिवर की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होने लगती हैं, तो यह अंग की प्राकृतिक कार्यक्षमता को नष्ट कर देती हैं। यह बीमारी इसलिए अधिक घातक है क्योंकि इसके शुरुआती संकेत इतने सूक्ष्म होते हैं कि रोगी उन्हें सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देता है।
कैंसर के प्रकार और जैविक संरचना
लिवर कैंसर को उसकी उत्पत्ति के आधार पर मुख्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
- हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा (HCC): यह लिवर कैंसर का सर्वाधिक पाया जाने वाला प्रकार है, जो सीधे लिवर की मुख्य कोशिकाओं (Hepatocytes) से प्रारंभ होता है।
- कोलैंजियोकार्सिनोमा: यह कैंसर पित्त नलिकाओं (Bile Ducts) में विकसित होता है। यद्यपि यह कम देखा जाता है, किंतु इसका उपचार अत्यधिक जटिल होता है।
जोखिम कारक और लक्षणों का विश्लेषण
विशेषज्ञों के अनुसार, दीर्घकालिक मदिरापान, हेपेटाइटिस B व C का संक्रमण और मोटापा लिवर कैंसर के प्रमुख कारण हैं।
शुरुआती चेतावनी संकेत:
- बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन में तीव्र गिरावट।
- पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में लगातार दर्द या भारीपन।
- त्वचा और आंखों में पीलापन (पीलिया) तथा लगातार उल्टी या मतली का अनुभव।
- अत्यधिक शारीरिक कमजोरी और भूख की कमी।
विशेषज्ञ परामर्श: समय पर जांच है अनिवार्य
- दिल्ली स्थित प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. आशीष सचान ने स्पष्ट किया है कि “लिवर कैंसर के मामले में ‘अर्ली डायग्नोसिस’ ही जीवन बचाने का एकमात्र तरीका है।” डॉ. सचान के अनुसार, सीटी स्कैन, एमआरआई और लिवर बायोप्सी जैसी तकनीकें बीमारी की सटीक अवस्था बताने में सक्षम हैं। यदि किसी व्यक्ति को फैटी लिवर की समस्या है, तो उसे नियमित अंतराल पर लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) करवाना चाहिए।
निष्कर्षतः, लिवर कैंसर एक मौन खतरा है जो धीरे-धीरे शरीर को खोखला कर देता है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और नशीले पदार्थों से दूरी बनाकर इस जानलेवा बीमारी के जोखिम को न्यूनतम किया जा सकता है। सतर्कता ही सुरक्षा है।

