द लोकतंत्र : चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, विटामिन D मानव शरीर के लिए एक अपरिहार्य पोषक तत्व है, जो न केवल हड्डियों के घनत्व (Bone Density) को बनाए रखता है, बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी सुदृढ़ करता है। यद्यपि सूर्य की किरणें इसका प्राथमिक स्रोत हैं, किंतु शहरीकरण और बंद कमरों की कार्यसंस्कृति ने बड़ी जनसंख्या में इसकी कमी पैदा कर दी है। हालिया शोधों से पुष्टि हुई है कि संतुलित आहार के माध्यम से विटामिन D का स्तर बनाए रखना संभव है, जिससे सिंथेटिक सप्लीमेंट्स पर बढ़ती निर्भरता को कम किया जा सकता है।
विटामिन D के प्राकृतिक भंडार
विटामिन D एक वसा-घुलनशील (Fat-soluble) विटामिन है, इसलिए इसे ऐसे खाद्य पदार्थों के साथ लेना चाहिए जिनमें हेल्दी फैट्स हो।
- फैटी फिश: सामन (Salmon) और मैकेरल जैसी मछलियां विटामिन D का सर्वश्रेष्ठ गैर-शाकाहारी स्रोत हैं। 100 ग्राम मछली से शरीर को लगभग 400-600 IU विटामिन D प्राप्त होता है। इसमें मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करने में सहायक होता है।
- अंडे की जर्दी: अक्सर लोग कोलेस्ट्रॉल के डर से अंडे का पीला भाग त्याग देते हैं, किंतु विटामिन D इसी हिस्से में संचित होता है। एक पूरा अंडा लगभग 50 IU तक पोषण प्रदान कर सकता है।
मशरूम और फोर्टिफिकेशन का प्रभाव
शाकाहारियों के लिए मशरूम एक विशिष्ट विकल्प प्रस्तुत करता है।
- धूप में उगे मशरूम: मनुष्यों की भांति मशरूम भी पराबैंगनी (UV) किरणों के संपर्क में आने पर विटामिन D का संश्लेषण करते हैं। इसकी एक सर्विंग से 200 से 400 IU तक विटामिन D मिल सकता है।
- फोर्टिफाइड डेयरी उत्पाद: चूंकि प्राकृतिक दूध में विटामिन D सीमित होता है, इसलिए बाजार में उपलब्ध फोर्टिफाइड दूध और दही एक बेहतरीन विकल्प हैं। दूध का कैल्शियम और विटामिन D का मेल अस्थि स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।
विशेषज्ञ परामर्श और अवशोषण की तकनीक
पोषण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सेवन पर्याप्त नहीं है, अपितु शरीर द्वारा इसका अवशोषण (Absorption) भी महत्वपूर्ण है। मैग्नीशियम और विटामिन K2 युक्त भोजन विटामिन D के कार्य को सुगम बनाते हैं। भविष्य में, खाद्य प्रौद्योगिकी में होने वाले सुधार अन्य दैनिक खाद्य पदार्थों को भी फोर्टिफाइड करने पर केंद्रित होंगे।
विटामिन D की कमी एक मूक महामारी की भांति फैल रही है। यद्यपि प्राकृतिक धूप का कोई विकल्प नहीं है, किंतु उपरोक्त खाद्य पदार्थों को दिनचर्या में शामिल करके इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। किसी भी बड़े आहार परिवर्तन से पूर्व चिकित्सकीय परामर्श अनिवार्य है।

