द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे और वहां संसद (क्नेस्सेट) में दिए गए संबोधन के बाद देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस सांसद Jairam Ramesh ने पीएम मोदी के उस बयान पर सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने अपने जन्मदिन और भारत द्वारा इज़रायल को मान्यता दिए जाने की तारीख का उल्लेख किया था। रमेश ने इसे मेजबान के पक्ष में “खुला समर्थन” बताया और भारत-इज़रायल संबंधों के ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखा।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जयराम रमेश ने लिखा कि भारत और इज़रायल के रिश्तों की नींव आज की नहीं, बल्कि आज़ादी के दौर में ही रखी जा चुकी थी। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के बीच हुए पत्राचार का हवाला दिया। रमेश के अनुसार, 13 जून 1947 को आइंस्टीन ने नेहरू को इज़रायल के गठन के विषय में पत्र लिखा था, जिसका उत्तर नेहरू ने एक महीने बाद दिया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 5 नवंबर 1949 को नेहरू और आइंस्टीन की मुलाकात प्रिंसटन स्थित आइंस्टीन के घर पर हुई थी।
रमेश ने यह भी कहा कि नवंबर 1952 में आइंस्टीन को इज़रायल के राष्ट्रपति पद की पेशकश हुई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। 1955 में निधन से पहले आइंस्टीन और नेहरू के बीच परमाणु हथियारों को लेकर भी पत्राचार हुआ था। कांग्रेस नेता का कहना है कि भारत-इज़रायल संबंधों का इतिहास बहुस्तरीय और दीर्घकालिक रहा है।
फ़िलिस्तीन मुद्दे पर विपक्ष की आलोचना, पीएम मोदी का शांति संदेश
प्रधानमंत्री मोदी की इज़रायल यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब गाजा क्षेत्र में संघर्ष और फ़िलिस्तीन मुद्दा अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भी इस दौरे को लेकर सवाल उठाए। इमरान मसूद ने कहा कि भारत का रुख फ़िलिस्तीन के समर्थन में स्पष्ट रहा है और प्रधानमंत्री को गाजा में बच्चों की मौत जैसे मुद्दों पर भी बात करनी चाहिए।
हालांकि, क्नेस्सेट में अपने ऐतिहासिक संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘गाजा पीस इनिशिएटिव’ का जिक्र करते हुए कहा कि यह पहल क्षेत्र में न्यायसंगत और स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारत संवाद, शांति और स्थिरता के पक्ष में खड़ा है और फ़िलिस्तीन मुद्दे के समाधान सहित सभी पक्षों के लिए संतुलित दृष्टिकोण का समर्थन करता है।
प्रधानमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा समर्थित है और भारत इसका समर्थन करता है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि शांति का मार्ग आसान नहीं होता, लेकिन वैश्विक समुदाय को मिलकर आगे बढ़ना चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत की पश्चिम एशिया नीति, इज़रायल-फ़िलिस्तीन संतुलन और ऐतिहासिक विरासत को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

