द लोकतंत्र : भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ते हुए, जस्टिस सूर्यकांत ने आज भारत के 53वें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के तौर पर शपथ ग्रहण की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। जस्टिस बीआर गवई के रविवार शाम रिटायर होने के बाद जस्टिस सूर्यकांत को इस सर्वोच्च न्यायिक पद पर नियुक्त किया गया है। उनके शपथ समारोह में देश की कई महान हस्तियों के साथ-साथ सात देशों के चीफ जस्टिस भी शामिल हुए, जिसने इस अवसर की महत्ता को और बढ़ा दिया। जस्टिस कांत का कार्यकाल लगभग 15 महीने का होगा और वे 9 फरवरी 2027 को 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर पद छोड़ देंगे।
संवैधानिक मामलों में अहम भूमिका
जस्टिस सूर्यकांत को सुप्रीम कोर्ट में उनके कार्यकाल के दौरान कई अहम संवैधानिक फैसलों और राष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील मामलों में उनकी भागीदारी के लिए जाना जाता है।
- प्रमुख फैसले: वे उन संवैधानिक पीठों का हिस्सा रहे हैं, जिन्होंने आर्टिकल 370 को हटाने, बिहार के वोटर लिस्ट में बदलाव और बहुचर्चित पेगासस स्पाईवेयर केस जैसे संवेदनशील मामलों पर सुनवाई की।
- संवैधानिक कानून पर प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट में उनके फैसलों में बोलने की आज़ादी और नागरिकता के मुद्दों पर दिए गए अहम निर्णय शामिल हैं, जो आज के संवैधानिक कानून की दिशा तय करने में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
- राज्यपाल/राष्ट्रपति की शक्ति: हाल ही में, जस्टिस कांत उस बेंच का भी हिस्सा थे जिसने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई की। इस मामले में राज्य विधानसभा द्वारा पास किए गए बिलों से निपटने में गवर्नर और प्रेसिडेंट की शक्तियों के दायरे की जाँच की गई। इस फैसले का अभी इंतजार है, लेकिन उम्मीद है कि इसका कई राज्यों पर बड़ा संवैधानिक असर होगा।
एक छोटे शहर से न्याय के शिखर तक
जस्टिस सूर्यकांत का व्यक्तिगत सफर भी प्रेरणादायक है।
- पृष्ठभूमि: उनका जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले में एक मिडिल-क्लास परिवार में हुआ था। उन्होंने एक छोटे शहर के प्रैक्टिशनर के तौर पर बार से देश के सबसे ऊंचे न्यायिक पद तक का सफर तय किया।
- शिक्षा और पूर्व पद: उन्होंने 2011 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर डिग्री पूरी की, जहाँ उन्हें ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ मिला था। सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले, वे 5 अक्टूबर 2018 से हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर कार्य कर रहे थे।
जस्टिस सूर्यकांत का लगभग 15 महीने का कार्यकाल भारत के संवैधानिक इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके नेतृत्व में, सुप्रीम कोर्ट को कई जटिल और राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर अंतिम निर्णय लेना है। न्यायपालिका में उनकी दक्षता और संवैधानिक मामलों की गहरी समझ उनके आगामी कार्यकाल के लिए आशा की किरण जगाती है, जिससे न्यायिक पारदर्शिता और समय पर न्याय मिलने की उम्मीदें बढ़ती हैं।

