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आनंदमठ पर साहित्यिक गोष्ठी: प्रवासी भवन में राष्ट्रभाव और राष्ट्रीय चेतना की ‘प्रतिनिधि कृति’ पर मंथन

Literary symposium on Anandmath: Discussion on the 'representative work' of nationalism and national consciousness at Pravasi Bhavan

द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : महान उपन्यासकार Bankim Chandra Chattopadhyay की कालजयी कृति आनंदमठ (Anandamath) पर शुक्रवार 27 फ़रवरी को अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा नई दिल्ली स्थित प्रवासी भवन में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य Anandamath में निहित राष्ट्रभाव, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक संदर्भों के प्रभाव को समझना था। गोष्ठी की अध्यक्षता इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर ने की, जबकि संचालन दक्षिणी विभाग की अध्यक्ष सारिका कालरा ने किया। वहीं, धन्यवाद ज्ञापन परिषद के केंद्रीय कार्यालय मंत्री संजीव सिन्हा ने किया।

राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक चेतना का पुनर्पाठ

वक्ताओं ने कहा कि ‘आनंदमठ’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय चेतना का सशक्त साहित्यिक दस्तावेज है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री मनोज कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि इस कृति ने भारत माता के सगुण-साकार रूप को प्रतिष्ठित किया और ‘भारत माता की जय’ के भाव को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने बताया कि उपन्यास में एक आदर्श नागरिक के कर्तव्य, त्याग और राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च धर्म के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में विनोद बब्बर ने कहा कि ‘आनंदमठ’ पर अनेक विमर्श हो चुके हैं, फिर भी नए दृष्टिकोण से इसकी समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने उल्लेख किया कि इस कृति में जन्मभूमि की रक्षा को पवित्र कर्तव्य बताया गया है और राष्ट्र को देवी तथा माता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वक्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि उपन्यास 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के भीषण अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसके पात्र ‘संतान’ अपने व्यक्तिगत सुख, संपत्ति और पारिवारिक जीवन का त्याग कर मातृभूमि की मुक्ति के लिए समर्पित हो जाते हैं।

संगोष्ठी में जीवंत हुआ ‘आनंदमठ’ का राष्ट्रदर्शन

गोष्ठी में विशेष रूप से ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक और भावात्मक प्रभाव पर चर्चा हुई। बताया गया कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गया। इस गीत ने साहित्य को जनांदोलन की ऊर्जा में परिवर्तित कर दिया।

चर्चा के दौरान यह भी उभरकर सामने आया कि ‘आनंदमठ’ भारत की प्राचीन लोकतांत्रिक चेतना की ओर संकेत करता है। उपन्यास में संगठन, संवाद और सामूहिक निर्णय की जो परंपरा दिखाई देती है, वह बताती है कि भारत की सभ्यता मूलतः सहभागिता और उत्तरदायित्व की पक्षधर रही है। इस गोष्ठी में राकेश कुमार, वरुण कुमार, प्रिया वरुण कुमार, सुरेन्द्र अरोड़ा, सुनीता बुग्गा, बबीता किरण, मंजुल शर्मा, वेद प्रकाश मिश्र, मनोज शर्मा एवं ममता वालिया ने अपने विचार व्यक्त किए।

वक्ताओं ने कहा कि बंकिमचंद्र चटर्जी का उपन्यास आनंदमठ एक ऐतिहासिक साहित्यिक कृति है। 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित यह कृति राष्ट्र को देवी और मां के रूप में प्रतिष्ठित करती है। आनंदमठ भारतीय राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। इस उपन्यास में संगृहीत गीत वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बना। उपन्यास के पात्र यानी संतान अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए पारिवारिक सुख और संपत्ति का त्याग कर राष्ट्र सेवा को ही परम धर्म मानते हैं।

इस अवसर पर अ.भा. संयुक्त महामंत्री नीलम राठी, साहित्य परिक्रमा पत्रिका प्रबंधक रजनी मान, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के संयुक्त महामंत्री बृजेश गर्ग सहित कई साहित्यकार, शोधार्थी एवं पाठक उपस्थित रहे।

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Sudeept Mani Tripathi

Sudeept Mani Tripathi

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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हिंदी पत्रकारिता में परास्नातक। द लोकतंत्र मीडिया फाउंडेशन के फाउंडर । राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखता हूं। घूमने का शौक है।

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