द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने हालिया संबोधन में संगठन की कार्यप्रणाली से लेकर सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों तक कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में किसी भी पद के लिए जाति, वर्ग या क्षेत्र कोई मानक नहीं है। जिम्मेदारी उसी व्यक्ति को दी जाती है, जो समर्पित होकर काम करता है और उस भूमिका के लिए सबसे अधिक योग्य होता है। भागवत ने कहा कि सरसंघचालक बनने के लिए किसी विशेष समुदाय से होना जरूरी नहीं है योग्यता और कार्य ही सबसे बड़ा पैमाना है।
संगठन प्रचार से नहीं, बल्कि संस्कारों से आगे बढ़ता है
संघ की कार्यशैली पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संगठन प्रचार से नहीं, बल्कि संस्कारों से आगे बढ़ता है। व्यक्ति विशेष का प्रचार प्रसिद्धि तो दिला सकता है, लेकिन उससे अहंकार भी जन्म लेता है, जो संगठनात्मक भावना के लिए हानिकारक है। यही कारण है कि संघ हमेशा काम को प्राथमिकता देता है, न कि व्यक्तिगत पहचान को।
भाषा के मुद्दे पर भागवत ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी सीखना गलत नहीं है, बल्कि उसे इतनी दक्षता से सीखना चाहिए कि दुनिया प्रभावित हो, लेकिन अपनी जड़ों और मातृभाषा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। संघ के भीतर मातृभाषा के उपयोग पर जोर देते हुए उन्होंने संकेत दिया कि स्थानीय भाषाएं ही सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती हैं।
अपनी उम्र और सेवा भावना का जिक्र करते हुए भागवत ने बताया कि 75 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने स्वयं पद से हटने की इच्छा जताई थी, लेकिन कार्यकर्ताओं ने उन्हें सेवा जारी रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि पद से निवृत्ति संभव है, लेकिन समाज के लिए काम करने की भावना से नहीं। जब तक क्षमता है, तब तक राष्ट्र सेवा जारी रहनी चाहिए।
सामाजिक एकता बनाए रखना ही देश की ताकत
मुस्लिम समाज के साथ संबंधों पर उन्होंने समावेशी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। भागवत ने कहा कि समाज में सभी का स्थान है और स्वयंसेवक विभिन्न समुदायों के बीच सेवा कार्य करते हैं। उनका मानना है कि सामाजिक एकता बनाए रखना ही देश की ताकत है। जनसंख्या और परिवार के विषय में उन्होंने संतुलन और संस्कारों को अधिक महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, बच्चों की संख्या से अधिक उनकी परवरिश और सामाजिक जिम्मेदारी मायने रखती है। वहीं धर्मांतरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि आस्था का चयन व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन किसी प्रकार का दबाव या लालच स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
घुसपैठ और रोजगार जैसे विषयों पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि देश के संसाधनों और अवसरों का लाभ नागरिकों को मिलना चाहिए। अवैध प्रवेश पर नियंत्रण सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि रोजगार सृजन के लिए मानवीय तकनीक और मजबूत अर्थव्यवस्था जरूरी है। उन्होंने गुणवत्ता आधारित उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया, ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।
आरक्षण पर भी सामने रखा दृष्टिकोण
आरक्षण और सामाजिक समानता पर उन्होंने कहा कि संविधान के अनुरूप सभी आरक्षणों का समर्थन किया जाना चाहिए। समाज के कमजोर वर्गों को आगे लाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। भागवत के अनुसार, सामाजिक सद्भाव तभी संभव है जब आगे बढ़ चुके लोग सहयोग का हाथ बढ़ाएं और पीछे छूटे लोगों को साथ लेकर चलें।
राजनीति और समाज के संबंध पर उन्होंने टिप्पणी की कि अक्सर चुनावी गणित सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देता है, इसलिए समाज को जागरूक और संतुलित रहना होगा। सोशल मीडिया के प्रभाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह सोच-समझकर अपनी बात रखे, क्योंकि शब्द भी समाज को जोड़ सकते हैं और तोड़ भी सकते हैं।
कुल मिलाकर, मोहन भागवत का यह संबोधन संगठनात्मक सिद्धांतों के साथ-साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता पर जोर देने वाला रहा। उनके विचार इस बात की ओर संकेत करते हैं कि बदलते समय में परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर ही समाज को आगे बढ़ाया जा सकता है।

