द लोकतंत्र/ असम : असम में चुनावी माहौल दिन-ब-दिन गर्म होता जा रहा है और नेताओं के बयान अब खुलकर राजनीतिक टकराव का रूप लेते नजर आ रहे हैं। कछार में आयोजित एक जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रमुख नेता हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस और विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला।
उन्होंने कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सक्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें खुद भी अपनी हार का अंदेशा है, इसलिए उनकी चुनावी भागीदारी सीमित दिखाई दे रही है। सरमा ने यह भी कहा कि चुनाव के बाद प्रदेश में वही राजनीतिक नारा गूंजेगा जो भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व से जुड़ा होगा।
सरमा के इस बयान से यह संकेत स्पष्ट मिलता है कि भाजपा को अपनी जीत पर पूरा भरोसा है और वह विपक्ष को ज्यादा प्रभावी चुनौती नहीं मान रही। उन्होंने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि उनके नारे चुनावी माहौल तक ही सीमित रहेंगे।
चुनावी मुद्दों से आगे बढ़कर पहचान की राजनीति
इस बार असम का चुनाव केवल विकास या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहचान, भूमि अधिकार और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में बदलता दिखाई दे रहा है। प्रवासन, अतिक्रमण और भूमि विवाद जैसे विषयों ने चुनावी बहस को और अधिक तीखा बना दिया है। यही वजह है कि नेताओं की भाषा भी अधिक आक्रामक और सीधे टकराव वाली हो गई है। राजनीतिक दल इन मुद्दों के जरिए मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।
ओवैसी का पलटवार और विपक्ष की रणनीति
इसी बीच बारपेटा में आयोजित रैली में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री सरमा के आरोपों का जवाब देते हुए राज्य सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार की कार्रवाई संविधान के अनुरूप नहीं है और विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। ओवैसी ने यह भी दावा किया कि भूमि से जुड़े मामलों में प्रभावित लोगों को वैकल्पिक व्यवस्था मिलनी चाहिए और इस संबंध में न्यायालय का भी रुख किया गया है।
ओवैसी ने सरकार की नीतियों को ‘दमनकारी’ बताते हुए कहा कि जनता इस बार मतदान के जरिए जवाब देगी। उन्होंने AIUDF के समर्थन की भी बात की और दावा किया कि अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों को सही तरीके से उठाने का काम उनकी पार्टी कर रही है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए।
असम की राजनीति में तीखी बयानबाज़ी नई बात नहीं है, लेकिन इस बार इसका स्तर पहले से अधिक तेज दिखाई दे रहा है। जहां भाजपा आत्मविश्वास के साथ चुनावी मैदान में उतरी है, वहीं विपक्ष भी सरकार की नीतियों को मुद्दा बनाकर माहौल बनाने में जुटा है। अब सबकी निगाहें मतदान की तारीख पर टिकी हैं, जहां जनता अपने वोट के जरिए यह तय करेगी कि किसकी रणनीति और दावे ज्यादा मजबूत साबित होते हैं।

