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संतुलन की डिप्लोमेसी: नए पीएम बालेंद्र शाह के नेतृत्व में कैसे बदल रहा है नेपाल का वैश्विक रुख?

The Diplomacy of Balance: How Is Nepal's Global Stance Changing Under the Leadership of New PM Balen Shah?

द लोकतंत्र/ नई दिल्ली डेस्क : नेपाल की राजनीति में एक नया अध्याय तब शुरू हुआ जब बालेंद्र शाह (बालेन) ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी विदेश नीति के संकेत दिए। 8 अप्रैल को काठमांडू में उन्होंने 17 देशों के राजदूतों और कूटनीतिक मिशनों के प्रमुखों से एक साथ मुलाकात की। इस बैठक में भारत, चीन, अमेरिका, जापान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कतर और संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रमुख वैश्विक साझेदार शामिल थे।

यह पहल नेपाल की पारंपरिक विदेश नीति से अलग मानी जा रही है, जहां पहले नेता द्विपक्षीय और अनौपचारिक मुलाकातों को प्राथमिकता देते थे। बालेन शाह का यह कदम स्पष्ट करता है कि उनकी सरकार एक व्यापक और संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाना चाहती है।

संतुलन की नीति: भारत-चीन से आगे बढ़ने की कोशिश

नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से दो ध्रुवों भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रही है। ऐतिहासिक रूप से, लोकतांत्रिक दलों को भारत के करीब और वामपंथी दलों को चीन समर्थक माना जाता रहा है। हालांकि, बालेन शाह इस परंपरा से हटकर एक निष्पक्ष और बहु-आयामी विदेश नीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। उनका मानना है कि नेपाल को किसी एक देश के प्रभाव में आने के बजाय सभी वैश्विक साझेदारों के साथ समान संबंध बनाए रखने चाहिए।

उन्होंने जिन देशों के राजदूतों से पहली बैठक की, उसमें न केवल पड़ोसी देश शामिल थे बल्कि खाड़ी देश और पश्चिमी राष्ट्र भी थे। यह संकेत देता है कि नेपाल अपनी आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं का विस्तार कर रहा है। खासकर खाड़ी देशों के साथ रिश्ते इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वहां काम कर रहे नेपाली नागरिकों से आने वाला विदेशी मुद्रा प्रवाह देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है।

नई कूटनीतिक दिशा: निवेश, प्रवासी और वैश्विक सहयोग

बालेन शाह की विदेश नीति का एक प्रमुख लक्ष्य नेपाल में विदेशी निवेश को बढ़ाना और प्रवासी नेपाली समुदाय के हितों की रक्षा करना है। यही कारण है कि उनकी कूटनीतिक पहल में जापान, स्विट्जरलैंड और खाड़ी देशों जैसे विकास और रोजगार से जुड़े साझेदारों को भी प्राथमिकता दी गई। नेपाल की भौगोलिक स्थिति भारत और चीन के बीच हमेशा से उसकी कूटनीतिक रणनीति को प्रभावित करती रही है। लेकिन अब नई सरकार इस स्थिति को अवसर में बदलने की कोशिश कर रही है।

इतिहास में भी नेपाल ने निष्पक्षता की नीति अपनाने की कोशिश की थी। बीरेन्द्र शाह ने 1970 और 80 के दशक में नेपाल को ‘शांति क्षेत्र’ घोषित करने का प्रस्ताव रखा था, हालांकि उसे भारत का समर्थन नहीं मिला। आज, बालेन शाह उसी विचार को आधुनिक तरीके से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं सीधे वैश्विक नेताओं से नहीं, बल्कि काठमांडू में मौजूद उनके प्रतिनिधियों के माध्यम से संवाद स्थापित कर।

आने वाले समय में बालेन शाह के विदेश दौरे उनकी नीति की दिशा को और स्पष्ट करेंगे। जहां एक ओर भारत और चीन उन्हें अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखने की कोशिश करेंगे, वहीं दूसरी ओर जापान और खाड़ी देशों जैसे नए साझेदार भी नेपाल के लिए महत्वपूर्ण बन सकते हैं। नेपाल की यह नई कूटनीति न केवल संतुलन बल्कि अवसरों के विस्तार की रणनीति है, जो देश को एक अधिक स्वतंत्र और वैश्विक भूमिका की ओर ले जा सकती है।

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Team The Loktantra

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