द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : अमेरिका की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of the United States ने पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की व्यापक टैरिफ नीति को असंवैधानिक ठहराते हुए 6-3 के बहुमत से रद्द कर दिया है। यह फैसला 20 फरवरी 2026 को सुनाया गया, जिसमें चीफ जस्टिस John Roberts ने बहुमत का निर्णय लिखा। उनके साथ जस्टिस एमी कोनी बैरेट, नील गोर्सच और तीन उदारवादी जजों ने सहमति जताई, जबकि क्लैरेंस थॉमस, सैमुअल अलिटो और ब्रेट कावानॉ ने असहमति दर्ज की। कोर्ट ने कहा कि 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत राष्ट्रपति को इतने व्यापक स्तर पर आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।
इस फैसले के बाद भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद Jairam Ramesh ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की सराहना करते हुए लिखा कि यह फैसला चेक एंड बैलेंस सिस्टम की मजबूती को दर्शाता है। उन्होंने 6-3 के फैसले को निर्णायक बताते हुए कहा कि अमेरिकी लोकतांत्रिक संस्थाएं अब भी प्रभावी ढंग से काम कर रही हैं।
पवन खेड़ा का सवाल: क्या भारत ने जल्दबाजी की?
कांग्रेस नेता Pawan Khera ने भी इस फैसले को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर भारत ने कुछ दिन और इंतजार किया होता, तो संभवतः उसे एकतरफा और प्रतिकूल व्यापार समझौते में नहीं जाना पड़ता। उन्होंने यह भी पूछा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने 2 फरवरी 2026 को देर रात वाशिंगटन से संपर्क क्यों किया और भारत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा करने की अपनी शुरुआती रणनीति क्यों बदली। खेड़ा ने विभिन्न संभावित कारणों का जिक्र करते हुए सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप की टैरिफ नीति पहले से विवादों में थी। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर ट्रंप ने दावा किया था कि 200% टैरिफ की धमकी देकर उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच 2025 के तनाव को कम कराया। हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने इस दावे को खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि संघर्ष विराम दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत का परिणाम था।
व्हाइट हाउस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘शर्मनाक’ करार दिया है और संकेत दिया है कि प्रशासन अन्य कानूनी विकल्पों के जरिए टैरिफ दोबारा लागू करने की कोशिश कर सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस आर्थिक एजेंडे को पूरी तरह छोड़ने के पक्ष में नहीं दिखते और संभव है कि वे कांग्रेस की मंजूरी लेने की दिशा में आगे बढ़ें। यह फैसला न केवल अमेरिकी राजनीति बल्कि वैश्विक व्यापार समीकरणों पर भी दूरगामी असर डाल सकता है।

