द लोकतंत्र/ पटना : बिहार में तेजस्वी यादव समेत कई प्रमुख नेताओं की सुरक्षा श्रेणी में बड़ा बदलाव किया है। राज्य स्तरीय सुरक्षा समीक्षा समिति की रिपोर्ट और ताज़ा खुफिया इनपुट्स के आधार पर लिए गए इस निर्णय में जहां विपक्ष को झटका लगा है, वहीं सत्ताधारी दल और केंद्र सरकार से जुड़े नेताओं का सुरक्षा घेरा पहले से ज्यादा मजबूत किया गया है। इस फैसले को प्रशासनिक बताया जा रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।
तेजस्वी यादव की सुरक्षा में कटौती, Z से Y+ किया गया कवर
इस फैसले का सबसे बड़ा असर बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर पड़ा है। अब तक उन्हें Z श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त थी, जिसे घटाकर अब Y+ श्रेणी में ला दिया गया है। इसके साथ ही तीन अन्य वरिष्ठ विपक्षी नेताओं जिनमे मुख्य रूप से मदन मोहन झा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी और राजेश राम की सुरक्षा पूरी तरह से वापस ले ली गई है। इस कदम को विपक्ष की ओर से गंभीरता से देखा जा रहा है और इसे राजनीतिक संदेश के तौर पर भी पढ़ा जा रहा है।
सत्ता पक्ष के नेताओं की सुरक्षा मजबूत, कई को मिली Z श्रेणी
जहां विपक्षी खेमे की सुरक्षा में कटौती हुई है, वहीं भाजपा और सरकार से जुड़े कई दिग्गज नेताओं की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और ललन सिंह को अब Z श्रेणी की सुरक्षा दी गई है। इसके अलावा बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी की सुरक्षा भी अपग्रेड की गई है। इन नेताओं को पहले Y या Y+ श्रेणी की सुरक्षा मिल रही थी, जिसे अब खतरे के आकलन के आधार पर बढ़ाया गया है।
Z और Y+ सुरक्षा में क्या है अंतर?
Z श्रेणी की सुरक्षा सबसे मजबूत मानी जाती है। इसके तहत किसी व्यक्ति को करीब 22 सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराए जाते हैं, जिनमें 4–5 प्रशिक्षित कमांडो, केंद्रीय बलों के जवान और स्थानीय पुलिस शामिल होती है। वहीं Y+ श्रेणी में कुल 11 सुरक्षाकर्मी होते हैं, जिनमें 1–2 कमांडो, निजी सुरक्षा अधिकारी और अन्य सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं। यानी सुरक्षा स्तर और निगरानी में दोनों के बीच बड़ा अंतर होता है।
सरकार का तर्क: राजनीति नहीं, खतरे का आकलन
गृह विभाग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह फैसला किसी राजनीतिक द्वेष या पक्षपात के आधार पर नहीं, बल्कि पूरी तरह से सुरक्षा एजेंसियों के खतरे के आकलन पर आधारित है। विभाग के मुताबिक, सुरक्षा समीक्षा समिति समय-समय पर सभी प्रमुख नेताओं की सुरक्षा का मूल्यांकन करती है और उसी के अनुरूप सुरक्षा बढ़ाने या घटाने की सिफारिश करती है।
सियासी बहस तेज
हालांकि सरकार इसे प्रशासनिक फैसला बता रही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते तनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। तेजस्वी यादव की सुरक्षा में कटौती और सत्ता पक्ष के नेताओं की सुरक्षा बढ़ाए जाने से यह मुद्दा आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में और गर्मा सकता है।

