द लोकतंत्र / नई दिल्ली : बहुजन समाज पार्टी (BSP) कभी दलित राजनीति की सबसे प्रभावशाली शक्ति मानी जाती थी, लेकिन आज पार्टी अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। हालात इस कदर बदल चुके हैं कि वर्ष 2026 पहली बार ऐसा होगा जब बसपा का संसद में कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं रहेगा।
लोकसभा में तो पार्टी पहले से ही शून्य है, अब राज्यसभा में भी बसपा के एकमात्र सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो जाएगा। उनके कार्यकाल के साथ बसपा की संसदीय उपस्थिति पूरी तरह खत्म हो जाएगी, जो पार्टी की 41 साल की राजनीतिक यात्रा में बड़ा गिरावट का संकेत है।
उत्तर प्रदेश से दस सीटें होंगी रिक्त, बसपा के लिए इस बार सीट पाना लगभग असंभव
राज्यसभा में अगले वर्ष उत्तर प्रदेश से दस सीटें रिक्त होंगी, जिनमें आठ भारतीय जनता पार्टी और एक-एक समाजवादी पार्टी व बसपा के सांसद रिटायर होंगे। बसपा के लिए इस बार सीट पाना लगभग असंभव है क्योंकि वर्तमान में पार्टी के पास केवल एक विधायक बचा है, जबकि एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 37 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। यह स्थिति बताती है कि बसपा अब संगठनात्मक और जनाधार दोनों स्तर पर कमजोर पड़ चुकी है।
कांशीराम के सपने की पार्टी कैसे आई इस मोड़ पर?
कांशीराम ने 1984 में बसपा की नींव रखी थी, और कुछ ही वर्षों में पार्टी उत्तर प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक दमदार उपस्थिति दर्ज कराने लगी। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने सूबे की सत्ता संभाली और राष्ट्रीय समीकरणों पर प्रभावी भूमिका निभाई। साल 2009 में पार्टी अपने चरम पर थी, जब उसने 21 लोकसभा सीटें जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया था। इसके बाद 2014 में मोदी लहर के बीच पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी, हालांकि वोट शेयर बरकरार रहा।
2019 में सपा गठबंधन के साथ बसपा ने वापसी की और 10 सीटें मिलीं, लेकिन गठबंधन ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। 2024 के चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत घटकर 2.07% रह गया और पार्टी पूरी तरह खाली हाथ लौट आई। यूपी विधानसभा में भी बसपा के सिर्फ एक विधायक बचे हैं, विधानपरिषद में भी पार्टी प्रतिनिधित्व शून्य हो चुका है।
क्या कठिन हो गई है बसपा की वापसी?
यह गिरावट सिर्फ चुनावी नतीजों का ग्राफ नहीं, बल्कि बसपा के राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक संरचना और जनाधार में आई लगातार कमजोरी की कहानी है। विशेषज्ञों का मानना है कि दलित राजनीति का स्वरूप बदल चुका है और नए नेतृत्व, नई रणनीति एवं जमीनी सक्रियता के बिना बसपा की वापसी कठिन होगी।
हालांकि मायावती यह दावा करती रही हैं कि बसपा फिर खड़ी होगी, लेकिन वर्तमान परिदृश्य यह संकेत दे रहा है कि पार्टी को नए सिरे से अपनी राजनीति, काडर और दृष्टि को आकार देना होगा। अन्यथा संसद से लेकर विधानमंडल तक बसपा की भूमिका सिर्फ इतिहास के किस्सों में सिमटने का खतरा है।

