द लोकतंत्र/ लखनऊ : प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर संगम नोज पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। देशभर से आए साधु-संतों और लाखों श्रद्धालुओं के कारण संगम क्षेत्र में अभूतपूर्व दबाव देखने को मिला। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को कड़े इंतजाम करने पड़े, लेकिन इसी दौरान एक घटना ने सियासी और धार्मिक दोनों स्तरों पर विवाद खड़ा कर दिया। अखिलेश यादव ने बीजेपी को आड़े हाथों लिया है।
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य Swami Avimukteshwaranand Saraswati को संगम नोज की ओर बढ़ने से प्रशासन द्वारा रोके जाने का मामला सामने आया। इस दौरान पुलिस और उनके समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की और हल्की झड़प की स्थिति भी बनी। घटना के बाद अब राजनीति तेज हो गई है और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी पर हमला बोला है।
अखिलेश यादव ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि साधु-संतों और श्रद्धालुओं के साथ इस तरह का व्यवहार अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा, साधु-संतों और भक्तों के साथ अप्रिय व्यवहार का समाचार बेहद पीड़ादायक है। भाजपा सरकार को ‘दिव्य-भव्य’ के दावों से पहले ‘सभ्य’ बनना चाहिए। अखिलेश यादव का यह बयान साफ तौर पर राज्य सरकार और प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है।
बीच रास्ते में रोके जाने का आरोप, बिना स्नान लौटे शंकराचार्य
मीडिया से बातचीत में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने दावा किया कि मौनी अमावस्या के दिन जब वे अपने अनुयायियों के साथ संगम नोज की ओर बढ़ रहे थे, तब पुलिसकर्मियों ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया। उनके अनुसार, स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि उन्हें और उनके शिष्यों को पवित्र स्नान किए बिना ही वापस अपने अखाड़े में लौटना पड़ा।
शंकराचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी पालकी को जानबूझकर बीच रास्ते में रोका गया और सीनियर पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की गई। हालात बिगड़ते देख उन्होंने आगे न बढ़ने का निर्णय लिया ताकि कोई बड़ा टकराव न हो। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में वे मौनी अमावस्या पर संगम स्नान नहीं करेंगे।
‘प्रशासन जो चाहे कर सकता है’ – शंकराचार्य की नाराजगी
पत्रकारों से बातचीत में शंकराचार्य ने प्रशासन के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, अब स्थिति यह है कि हमें पवित्र स्नान से रोका जा रहा है। हमने अपने अनुयायियों से वापस लौटने को कहा क्योंकि प्रशासन आगे बढ़ने नहीं दे रहा। हम टकराव नहीं चाहते, लेकिन यह प्रशासन पर निर्भर है कि वह क्या सही और क्या गलत मानता है। उनके इस बयान ने धार्मिक हलकों में भी असहजता पैदा कर दी है।
मौनी अमावस्या: माघ मेले का सबसे बड़ा स्नान पर्व
गौरतलब है कि मौनी अमावस्या प्रयागराज के Magh Mela का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण स्नान पर्व माना जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन साधु-संतों, अखाड़ों और आम श्रद्धालुओं की भारी भीड़ संगम में पवित्र स्नान के लिए पहुंचती है। रविवार को घना कोहरा और कड़ाके की ठंड होने के बावजूद लाखों श्रद्धालु तड़के से ही संगम घाट पर डटे रहे।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने संगम क्षेत्र में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, भारी पुलिस बल, सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन के जरिए निगरानी की व्यवस्था की थी। बावजूद इसके, शंकराचार्य से जुड़ी इस घटना ने प्रशासनिक प्रबंधन और संवेदनशीलता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सियासी संकेत और आगे की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम के बाद यह मामला सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक आस्था, संतों के सम्मान और सरकार की प्राथमिकताओं पर बहस का विषय बन गया है। अखिलेश यादव के बयान से साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सियासी रूप से और गरमा सकता है, खासकर तब जब माघ मेले जैसे धार्मिक आयोजन में संतों और श्रद्धालुओं की भूमिका अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है।

