द लोकतंत्र : भारतीय संस्कृति में ‘गुरु’ को साक्षात परब्रह्म का रूप स्वीकार किया गया है। शिक्षण संस्थानों में आज भी छात्रों द्वारा शिक्षकों के चरण स्पर्श करने की परंपरा अक्षुण्ण है। किंतु, हाल ही में आध्यात्मिक जगत में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरा है— क्या बिना किसी साधना के दूसरों से चरण स्पर्श करवाना पुण्य क्षीण होने का कारण बनता है? विख्यात संत प्रेमानंद जी महाराज ने एक महिला शिक्षिका की जिज्ञासा का समाधान करते हुए इस विषय पर गहन प्रकाश डाला है, जो आधुनिक शिक्षकों के लिए एक मार्गदर्शिका सिद्ध हो सकता है।
पुण्य क्षय का भय और आध्यात्मिक तर्क
शिक्षिका की चिंता थी कि मना करने के बावजूद जब बच्चे उनके पैर छूते हैं, तो क्या उनके द्वारा अर्जित शुभ कर्मों का ह्रास होता है?
- ऊर्जा का विनिमय: महाराज के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा का अंश विराजमान है। जब कोई व्यक्ति अज्ञानतावश या केवल अहंकार में पैर छुआता है, तो उसकी ऊर्जा का प्रवाह प्रभावित होता है। बिना किसी मानसिक सजगता के सम्मान ग्रहण करना वास्तव में पुण्य को कम कर सकता है।
- शिक्षक की दुविधा: शिक्षक अक्सर स्नेहवश बच्चों को नहीं टोक पाते, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह चिंता तर्कसंगत है कि क्या हम उस सम्मान के अधिकारी हैं?
प्रेमानंद जी का समाधान: ‘मानसिक प्रणाम’ की शक्ति
महाराज ने इस जटिल स्थिति से बचने का एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली उपाय सुझाया है।
- ईश्वर को समर्पण: यदि कोई छात्र आपके पैर छूता है, तो उस क्षण अपने मन में इष्टदेव (भगवान) का स्मरण करें। यह भाव रखें कि सामने वाला बालक आपके भीतर बैठे ईश्वर को प्रणाम कर रहा है।
- प्रतिउत्तर में प्रणाम: जब बच्चा पैर छूए, तो शिक्षक को भी मानसिक रूप से उस बच्चे के हृदय में विराजमान परमात्मा को प्रणाम कर लेना चाहिए। इससे अहंकार शून्य हो जाता है और पुण्य सुरक्षित रहता है।
परंपरा और जागरूकता का संतुलन
- आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जहाँ मनोविज्ञान पर जोर दिया जाता है, वहीं आध्यात्मिक सतर्कता शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक बल को बढ़ावा देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रेमानंद जी के ये विचार गुरु-शिष्य परंपरा में विनम्रता और परस्पर सम्मान को नई ऊंचाई प्रदान करेंगे। आगामी दशकों में भारतीय मूल्य-आधारित शिक्षा में ऐसे आध्यात्मिक सूत्रों की प्रासंगिकता और बढ़ेगी।
निष्कर्षतः, श्रद्धा और पुण्य का संगम केवल सजगता में निहित है। शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों के स्नेह को स्वीकार करें, किंतु उसे परमात्मा के चरणों में अर्पित कर दें। इससे न केवल परंपरा जीवित रहेगी, अपितु शिक्षक की आध्यात्मिक ऊर्जा भी वर्धित होगी।

