द लोकतंत्र : सनातन धर्म के प्रख्यात संत और वृंदावन की विभूतियों में शुमार प्रेमानंद जी महाराज अपने सरल किंतु सटीक प्रवचनों के लिए विश्व भर में चर्चा का विषय बने हुए हैं। हाल ही में उनका एक वीडियो डिजिटल मंचों पर तीव्रता से प्रसारित हो रहा है, जिसमें वे गृहस्थों को घर के मंदिर में रखी जाने वाली वस्तुओं के विषय में चेतावनी देते नजर आ रहे हैं। महाराज के अनुसार, मंदिर की ऊर्जा अत्यंत सूक्ष्म होती है और वहां रखी अनुचित सामग्री व्यक्ति के मानसिक, आर्थिक और शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
देव स्थान बनाम पितृ स्थान: सीमा रेखा का महत्व
अक्सर लोग श्रद्धावश अपने दिवंगत पूर्वजों की तस्वीरें देवताओं के मध्य रख देते हैं, जिसे प्रेमानंद महाराज ने शास्त्रों के प्रतिकूल बताया है।
- महाराज स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं और पूर्वज आदरणीय। दोनों का स्थान एक करने से ऊर्जा में टकराव होता है, जिसका परिणाम दरिद्रता और आर्थिक कष्टों के रूप में सामने आता है।
- पूर्वजों का स्मरण घर की दक्षिण दीवार पर तस्वीर लगाकर किया जाना चाहिए, किंतु उन्हें पूजा वेदी पर स्थान नहीं देना चाहिए।
खंडित वस्तुएं: नकारात्मकता का प्राथमिक स्रोत
मंदिर में किसी भी प्रकार की क्षतिग्रस्त सामग्री का होना अशुभ माना जाता है।
- फटी तस्वीरें एवं पुस्तकें: जीर्ण-शीर्ण धार्मिक ग्रंथ या फटी हुई ईश्वरीय छवियां फिजूलखर्ची को बढ़ावा देती हैं। यह व्यक्ति की एकाग्रता को भंग करके सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
- निर्माल्य (सूखे फूल): पूजा में अर्पित किए गए पुष्प यदि सूख जाएं, तो वे सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करते हैं। इन्हें नियमित रूप से हटाकर पवित्र स्थान या जल में विसर्जित करना चाहिए।
तस्वीर नहीं, तत्व महत्वपूर्ण
- एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम बताते हुए महाराज कहते हैं कि घर के मंदिर में किसी भी जीवित साधु-संत की तस्वीर नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क है कि जीवित गुरु की पूजा उनके दिए गए ज्ञान को आचरण में उतारने से होती है। देव मंदिर में केवल इष्ट देव और परब्रह्म के स्वरूपों का ही आधिपत्य होना चाहिए।
प्रेमानंद जी महाराज का यह संदेश आधुनिक युग में भ्रमित श्रद्धालुओं के लिए एक मार्गदर्शक की भांति है। नियमबद्ध पूजा न केवल मानसिक शांति प्रदान करती है, अपितु वास्तु दोषों का निवारण करके समृद्धि के द्वार भी खोलती है। वृंदावन के इस संत की वाणी ने पुनः सिद्ध किया है कि सनातन धर्म के सूक्ष्म नियम पूर्णतः तार्किक और कल्याणकारी हैं।

