द लोकतंत्र : सनातन परंपरा में माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, जिसे सकट चौथ कहा जाता है, मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्म-अनुशासन की एक कठिन प्रक्रिया है। वर्ष 2026 में यह पर्व 6 जनवरी को मनाया जा रहा है। ज्योतिषाचार्यों और धर्मशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि इस व्रत के दौरान नियमों में की गई सूक्ष्म लापरवाही भी व्रत के आध्यात्मिक परिणामों को प्रभावित कर सकती है। संतान सुख और पारिवारिक विघ्नों के नाश के लिए किए जाने वाले इस व्रत में एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।
एकाग्रता का संकट: डिजिटल व्याकुलता से बचाव
वर्तमान दौर में पूजा के समय एकाग्रता भंग होना एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, पूजा के समय मन का विचलित होना अनुष्ठान की ऊर्जा को नष्ट कर देता है।
- सावधानी: मोबाइल फोन अथवा अनर्गल वार्तालाप से दूरी बनाए रखें। यदि व्रती का ध्यान साधना के बजाय बाहरी व्याकुलताओं में लीन रहता है, तो शास्त्रों के अनुसार व्रत का पुण्य फल न्यूनतम हो जाता है। शुद्ध अंतःकरण और शांत वातावरण ही भगवान गणेश के आवाहन के लिए अनिवार्य है।
मंत्रोच्चार और अर्घ्य: ध्वनि विज्ञान का महत्व
सकट चौथ पर चंद्र दर्शन के पश्चात अर्घ्य देने का विधान अत्यंत विशिष्ट है। यह प्रक्रिया केवल जल अर्पित करना नहीं है, बल्कि मंत्रों के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा को स्वयं में समाहित करना है।
- सटीक मंत्राभ्यास: ‘ॐ सोमाय नमः’ अथवा ‘ॐ चंद्राय नमः’ के जाप में त्रुटि नहीं होनी चाहिए। विद्वानों का तर्क है कि अपूर्ण मंत्रोच्चार से चंद्रमा और गणेशजी की पूर्ण कृपा प्राप्त नहीं होती। ध्वनि का सही कंपन ही मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।
- अर्घ्य विधि: तांबे के पात्र से दी गई धारा अटूट होनी चाहिए, जो साधक की अखंड श्रद्धा का प्रतीक है।
आहार शुद्धि: जैविक और आध्यात्मिक प्रभाव
सकट चौथ के दिन आहार का संयम सीधे तौर पर आपके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है।
- व्रत के दौरान तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन या अत्यधिक तला-भुना) मानसिक विक्षेप पैदा करता है। तिल और गुड़ का सेवन न केवल परंपरा है, बल्कि यह सर्दियों में शरीर को ऊष्म (Warmth) रखने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है। अनियमित भोजन से चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है, जो व्रत के मूल उद्देश्य—पारिवारिक शांति—के विपरीत है।
निष्कर्षतः, सकट चौथ का व्रत अनुशासन और समर्पण का संगम है। 6 जनवरी 2026 को यदि श्रद्धालु इन शास्त्रोक्त नियमों का पालन मनोयोग से करते हैं, तो निश्चित ही यह व्रत अभूतपूर्व आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला सिद्ध होगा। नियमों की मर्यादा ही भक्ति की शुद्धता तय करती है।

