द लोकतंत्र : आज 6 जनवरी 2026 को संपूर्ण भारत में श्रद्धा और भक्ति के साथ ‘सकट चौथ’ मनाया जा रहा है। माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी, तिल अथवा माघी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व मुख्यतः माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु और परिवार पर आने वाले संकटों के निवारण हेतु किया जाता है। आज की पूजा में भगवान गणेश, सकट माता और चंद्रदेव की त्रिवेणी उपासना का विशेष विधान है, जो भक्तों के जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता लाती है।
पौराणिक महत्व: विघ्नहर्ता के पुनर्जन्म की गाथा
सकट चौथ की कथा का श्रवण करना इस व्रत का एक अनिवार्य अंग माना गया है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, कथा सुनने से ही व्रत की पूर्णता सिद्ध होती है।
- मातृ आज्ञा और त्याग: पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब माता पार्वती के आदेश पर बाल गणेश द्वार पर पहरा दे रहे थे, तब उन्होंने स्वयं महादेव को भी भीतर प्रवेश से रोक दिया। यह घटना कर्तव्यनिष्ठा का चरम उदाहरण है।
- गजानन का प्राकट्य: क्रोधित शिव द्वारा गणेश का मस्तक अलग करने और पश्चात माता पार्वती की व्याकुलता ने ब्रह्मांड में एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया था। तदुपरांत, गजमुख (हाथी का सिर) लगाकर गणेश जी का पुनरुद्धार हुआ। मान्यता है कि जिस प्रकार शिव जी ने गणेश के प्राणों की रक्षा की, उसी प्रकार गणेश जी व्रत रखने वाली माताओं की संतान पर आने वाले संकटों को हर लेते हैं।
खगोलीय महत्व: आज रात चंद्रदर्शन और पारण
सकट चौथ का व्रत बिना चंद्रदर्शन के अपूर्ण माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से चंद्रमा मन का कारक है और गणेश जी बुद्धि के, अतः इनका संयोग मानसिक शांति प्रदान करता है।
- चंद्रोदय का समय: आज रात 08:54 बजे चंद्रदेव के दर्शन होंगे। भक्तों को तांबे के पात्र में दूध, जल, अक्षत और पुष्प मिश्रित करके चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।
- तिलकुटा का भोग: चूंकि इसे तिल चतुर्थी भी कहा जाता है, अतः तिल और गुड़ से बने प्रसाद का दान और भोग अक्षय पुण्य देता है।
निष्कर्षतः, सकट चौथ का यह महापर्व विश्वास और साधना का उत्सव है। गणेश जी की कथा हमें सिखाती है कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, धैर्य और ईश्वर की कृपा से उसे टाला जा सकता है। आज रात चंद्रोदय के पश्चात अर्घ्य देने के साथ ही लाखों श्रद्धालुओं का संकल्प पूर्ण होगा।

