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भगवान ने क्यों रचा यह संसार? संत प्रेमानंद महाराज ने लीला और समर्पण के माध्यम से सुलझाई जटिल गुत्थी

The loktnatra

द लोकतंत्र : मानव सभ्यता के इतिहास में यह प्रश्न सदैव अक्षुण्ण रहा है कि इस विशाल सृष्टि का उद्देश्य क्या है? हाल ही में वृंदावन के प्रख्यात संत प्रेमानंद महाराज ने एक जिज्ञासु भक्त के संवाद के दौरान इस जटिल दार्शनिक प्रश्न का निराकरण किया। महाराज जी ने स्पष्ट किया कि ईश्वर द्वारा संसार का निर्माण किसी अभाव या आवश्यकता की पूर्ति नहीं, अपितु एक ‘सहज आनंद’ की अभिव्यक्ति है। उनका यह व्याख्यान वेदांत के प्राचीन सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करता है।

एकोहं बहुस्याम: एक से अनेक होने का संकल्प

प्रेमानंद महाराज ने उपनिषदों के महान वाक्य ‘एकोहं बहुस्याम’ का उल्लेख करते हुए सृष्टि के मनोविज्ञान पर प्रकाश डाला।

  • खिलाड़ी और खेल: महाराज जी के अनुसार, जब परमात्मा को स्वयं के एकाकीपन में खेलने का भाव आया, तो उन्होंने स्वयं को ही जड़ (Matter) और चेतन (Consciousness) के असंख्य रूपों में विस्तारित कर दिया। वे स्वयं ही खेल के मैदान हैं, स्वयं ही खिलाड़ी हैं और स्वयं ही इस खेल के साक्षी भी हैं।
  • लीला का स्वरूप: सृष्टि के निर्माण और प्रलय को उन्होंने एक बालक की चेष्टा के समान बताया। जैसे एक शिशु मिट्टी के घरौंदे बनाता है और उन्हें स्वेच्छा से मिटा देता है, ब्रह्मांड का चक्र भी ईश्वर की उसी मौज का प्रतिबिंब है।

माया का प्रभाव और ईश्वरीय इच्छा

अक्सर यह शंका प्रकट की जाती है कि क्या निर्गुण ईश्वर में इच्छाएं संभव हैं? प्रेमानंद महाराज ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान की इच्छा सांसारिक इच्छाओं की तरह स्वार्थी नहीं होती।

  • योग निद्रा और प्रकृति: सृष्टि के प्रारंभ में परमात्मा के हृदय में स्थित ‘माया’ या ‘प्रकृति’ जागृत होती है। यही शक्ति परमात्मा को सृजन के लिए प्रेरित करती है।
  • माया का परदा: यही माया जीवात्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से विस्मृत कराती है, ताकि यह सांसारिक खेल रोमांचक बना रहे।

तर्क की सीमितता एवं समर्पण का अमृत

  • संत जी ने कठोरता से कहा कि मानवीय बुद्धि परमात्मा को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। बुद्धि स्वयं प्रकृति का एक सूक्ष्म अंश है, अतः वह अपने अंशी (परमात्मा) को पूर्णतः नहीं नाप सकती। जब साधक तर्क करते-करते थक जाता है, तब ‘समर्पण’ का द्वार खुलता है। जब कोई भक्त निरंतर नाम-जप करता है, तो परमात्मा उसकी बुद्धि को ‘दिव्य बुद्धि’ में परिवर्तित कर देते हैं, जिससे अगोचर को भी जाना जा सकता है।

निष्कर्षतः, प्रेमानंद महाराज का यह दर्शन हमें सिखाता है कि सृष्टि कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक दिव्य नियोजन है। इस सत्य को स्वीकार करने से जीवन में अनावश्यक तनाव और अहंकार समाप्त हो जाता है। वर्तमान भौतिकवादी युग में, महाराज जी की यह सीख आंतरिक शांति प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम है।

Uma Pathak

Uma Pathak

About Author

उमा पाठक ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में स्नातक और बीएचयू से हिन्दी पत्रकारिता में परास्नातक किया है। पाँच वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाली उमा ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं। उमा पत्रकारिता में गहराई और निष्पक्षता के लिए जानी जाती हैं।

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