द लोकतंत्र: हिंदू धर्म में शंख (Shankha) का विशेष महत्व है। इसे पूजा और धार्मिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। प्राचीन काल से ही शंख बजाने की परंपरा चली आ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शंख की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके वातावरण को पवित्र बनाती है। यही कारण है कि हर शुभ अवसर पर शंख बजाना बेहद शुभ माना जाता है।
पूजा में शंख का महत्व
शंख को शुद्धता, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि पूजा या किसी भी मांगलिक कार्य में शंख बजाने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शंख की ध्वनि वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाती है।
श्रीकृष्ण का पांचजन्य शंख
महाभारत के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पास पांचजन्य नामक शंख था। पौराणिक कथाओं के मुताबिक श्रीकृष्ण ने यह शंख एक राक्षस को पराजित कर प्राप्त किया था। महाभारत युद्ध में युद्ध की शुरुआत और समाप्ति का संकेत वे इसी शंख से देते थे।
पांडवों और कौरवों के शंख
महाभारत में पांडवों और कौरवों के पास अलग-अलग शंख थे।
- युधिष्ठिर के पास अनंतविजय शंख था।
- भीम के पास पौंड्र शंख।
- अर्जुन के पास देवदत्त शंख।
- नकुल के पास सुघोष और सहदेव के पास मणिपुष्पक शंख था।
- दुर्योधन के पास विदारक और कर्ण के पास हिरण्यगर्भ शंख था।
शंख से जुड़ी मान्यताएँ
- शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, इसलिए इसे माता लक्ष्मी का भाई भी माना जाता है।
- दक्षिणावर्ती शंख भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का प्रतीक है।
- गणेश शंख संतान सुख के लिए विशेष माना गया है।
- वास्तु शास्त्र में शंख को पूजा घर की उत्तर या पूर्व दिशा में रखने की सलाह दी गई है।
शंख केवल पूजा का साधन नहीं है, बल्कि यह भारतीय परंपरा और आस्था का प्रतीक भी है। इसकी ध्वनि जहां वातावरण को पवित्र करती है, वहीं इसे रखने और पूजने से सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

