द लोकतंत्र : सनातन धर्म में पूजा-उपासना के विभिन्न चरणों में ‘नैवेद्य’ या ‘भोग’ अर्पित करने का विधान अत्यंत प्राचीन है। आधुनिक तर्कसंगत युग में अक्सर यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि जब परमेश्वर निराकार हैं अथवा साक्षात भोजन ग्रहण नहीं करते, तो अन्न अर्पण की प्रासंगिकता क्या है? धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भोग लगाना महज एक दिखावा नहीं, अपितु यह कर्म शुद्धि, अन्न दोष निवारण और अहंकार के विलीनीकरण की एक परिष्कृत प्रक्रिया है।
अन्न शुद्धि एवं ऊर्जा का स्थानांतरण
शास्त्रों के अनुसार भोजन केवल शरीर के पोषण का आधार नहीं, बल्कि यह मन के विचारों को भी गढ़ता है।
- अन्न दोष निवारण: माना जाता है कि भोजन बनाने वाले के विचार और अन्न अर्जन की विधि का प्रभाव भोजन पर पड़ता है। जब वही भोजन ईश्वर को अर्पित किया जाता है, तो उसमें निहित नकारात्मक स्पंदन (Vibrations) समाप्त हो जाते हैं और वह ‘प्रसाद’ में परिवर्तित हो जाता है।
- सात्विक परिवर्तन: भोग अर्पण के पश्चात भोजन में सात्विक गुणों की वृद्धि होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यह कृतज्ञता का भाव है, जो भोजन ग्रहण करने वाले के मानसिक स्वास्थ्य को सकारात्मक बनाता है।
मनोवैज्ञानिक पक्ष: अहंकार का विसर्जन और त्याग
भोग लगाने की प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर ‘मैं’ और ‘मेरा’ के अहंकार को नष्ट करती है।
- ईश्वर का स्वामित्व: यह स्वीकार करना कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु ईश्वर की है, मनुष्य को विनम्र बनाता है। भोग लगाते समय जातक कहता है- “तेरा तुझको अर्पण”, जो संसार के प्रति आसक्ति को कम करता है।
- वितरण का दर्शन: निजी उपयोग के लिए बनाया गया भोजन अक्सर व्यक्तिगत होता है, किंतु भगवान का भोग लगते ही वह सामूहिक हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ व्यक्ति स्वयं से ऊपर उठकर समाज और सेवा के बारे में सोचता है।
सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश
- मंदिरों में होने वाला अन्नकूट या भंडारा भोग की इसी त्याग भावना का विस्तार है। यह परंपरा सिखाती है कि साझा करना ही सच्ची भक्ति है। आध्यात्मिक गुरुओं का तर्क है कि भगवान भोजन के नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे ‘भाव’ के भूखे होते हैं। यही कारण है कि शबरी के जूठे बेर या विदुर की भाजी को भगवान ने छप्पन भोग से ऊपर स्थान दिया।
निष्कर्षतः, भगवान को भोग लगाना केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्य को संयमित, कृतज्ञ और अहंकारमुक्त बनाने का एक मनोवैज्ञानिक मार्ग है। यह हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति से जो कुछ भी प्राप्त करते हैं, उसे ससम्मान ईश्वर को समर्पित करके ही ग्रहण करना चाहिए। यही प्रसाद संस्कृति भारतीय जीवन दर्शन की मूलाधार है।

