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वास्तु विश्लेषण: घर की दिशा और दर्पण का प्रभाव; कंगाली ला सकता है गलत दिशा में लगा Mirror

The loktnatra

द लोकतंत्र : हिंदू स्थापत्य कला और वास्तु शास्त्र में घर की प्रत्येक वस्तु के स्थान को ऊर्जा के प्रवाह से जोड़कर देखा जाता है। इसी कड़ी में ‘दर्पण’ यानी शीशे को अत्यंत प्रभावशाली उपकरण माना गया है। वास्तु विदों का मत है कि दर्पण न केवल छवि को प्रतिबिंबित करता है, अपितु यह ऊर्जा को परावर्तित करने की क्षमता भी रखता है। सही दिशा में लगा दर्पण जहाँ समृद्धि के द्वार खोलता है, वहीं गलत स्थान पर इसकी मौजूदगी वास्तु दोष उत्पन्न करके आर्थिक कंगाली का कारण बन सकती है।

शुभ दिशाएं: धन और शांति का आगमन

वास्तु शास्त्र के अनुसार, दर्पण लगाने के लिए उत्तर और पूर्व दिशाएं सर्वश्रेष्ठ मानी गई हैं।

  • उत्तर दिशा (कुबेर का स्थान): यह दिशा धन के देवता कुबेर की मानी जाती है। उत्तर की दीवार पर लगा दर्पण आर्थिक अवसरों को प्रतिबिंबित करके उन्हें दोगुना करने में सहायक होता है। इससे न केवल सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, बल्कि अनावश्यक खर्चों पर भी लगाम लगती है।
  • पूर्व दिशा (सकारात्मकता का स्त्रोत): सूर्य की इस दिशा में दर्पण लगाने से घर में निरोग्यता और यश का प्रवेश होता है। यह व्यक्ति के आत्मविश्वास को जागृत करने और सामाजिक संबंधों को सुधारने में मददगार है।
  • पश्चिम दिशा: इस दिशा में दर्पण लगाने से पारिवारिक सामंजस्य और दांपत्य जीवन में मधुरता आती है। हालांकि, यहाँ विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है कि दर्पण सीधे किचन के सामने न हो।

अशुभ दिशा: यम की दृष्टि और आर्थिक हानि

वास्तु में दक्षिण दिशा को अत्यंत संवेदनशील माना गया है। इसे यमराज की दिशा माना जाता है। यदि इस दीवार पर दर्पण लगाया जाता है, तो यह घर की स्थिर पूंजी को नष्ट करने लगता है। दक्षिण में लगा शीशा कैश फ्लो को अस्थिर करता है और परिवार के सदस्यों के मध्य वैचारिक मतभेद पैदा कर सकता है।

रखरखाव और आकार: सूक्ष्म नियमों का पालन

दर्पण के प्रकार और उसकी अवस्था का भी गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है:

  • स्वच्छता: धुंधला या गंदा शीशा नकारात्मक विचारों को जन्म देता है। दर्पण को हमेशा प्रतिबिंब के अनुरूप साफ रखना अनिवार्य है।
  • अवस्था: टूटा हुआ या चटका हुआ शीशा घर में विनाशकारी ऊर्जा का संचय करता है। ऐसे शीशे को तत्काल घर से हटा देना चाहिए।
  • आकार: सामान्यता घरेलू उपयोग के लिए 1 से 2 फीट के वर्गाकार या आयताकार दर्पण उपयुक्त होते हैं। विशालकाय शीशे ऊर्जा के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।

भविष्य का दृष्टिकोण: आधुनिक वास्तुकला में एककीकरण

  • आजकल इंटीरियर डिजाइनर वास्तु विशेषज्ञों के परामर्श से ही दर्पणों का स्थान निर्धारित करते हैं। आने वाले समय में, घर की बनावट में प्राकृतिक रोशनी और दर्पण के सही कोण पर अधिक शोध देखने को मिल सकता है, जो मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होगा।

निष्कर्षतः, दर्पण सिर्फ एक उपकरण नहीं बल्कि वास्तु का एक सशक्त स्तंभ है। नियमों के अनुसार इसका चयन न केवल घर को सुंदर बनाता है, बल्कि आर्थिक और मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

Uma Pathak

Uma Pathak

About Author

उमा पाठक ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में स्नातक और बीएचयू से हिन्दी पत्रकारिता में परास्नातक किया है। पाँच वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाली उमा ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं। उमा पत्रकारिता में गहराई और निष्पक्षता के लिए जानी जाती हैं।

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