द लोकतंत्र/ देवरिया : रविवार 11 जनवरी को उत्तर प्रदेश के देवरिया में गोरखपुर रोड ओवरब्रिज के नीचे बनी अब्दुल गनी शाह मजार पर हुई बुलडोजर कार्रवाई को महज प्रशासनिक कदम कहना अधूरा होगा। यह कार्रवाई असल में उस लंबी लड़ाई का परिणाम है, जिसे देवरिया सदर विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने जनभावनाओं, कानून और सरकारी भूमि की रक्षा के लिए लड़ा। रविवार को जब मजार के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई तो इसे पूरे जिले में ‘विधायक की जीत और न्याय की जीत’ के तौर पर देखा गया। विधायक शलभ मणि ने उस ‘डर’ से टकराने की हिम्मत की जिससे सब भागते रहे।
दरअसल, यह कार्रवाई एसडीएम न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बाद की गई, जिसमें उक्त भूमि को दोबारा बंजर घोषित करते हुए अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे। पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद रहे और क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखी गई।
देवरिया में सिर्फ मजार नहीं गिरी, एक ‘मोड्स ऑपरेंडी’ भी टूटी
देवरिया की गोरखपुर रोड पर ओवरब्रिज के नीचे रविवार को जो हुआ, उसे अगर आप सिर्फ ‘बुलडोजर एक्शन’ समझ रहे हैं, तो आप कहानी का सबसे सतही हिस्सा देख रहे हैं। असल में वहां एक मजार नहीं, बल्कि सालों से चल रहा एक तरीका, एक मोडस ऑपरेंडी (Modus Operandi) ढहा है। वही तरीका, जिसमें पहले सरकारी जमीन पर कब्जा होता है, फिर उसे धार्मिक रंग दिया जाता है, फिर फर्जी कागज़ तैयार होते हैं और आखिर में प्रशासन, राजनीति और डर का ऐसा जाल बुन दिया जाता है कि कोई उंगली उठाने की हिम्मत न करे।
देवरिया की गोरखपुर रोड पर 11 जनवरी 2026, रविवार की दोपहर बिलकुल भी आम नहीं थी। ओवरब्रिज के नीचे पुलिस की तैनाती, बैरिकेडिंग और बुलडोज़र की गड़गड़ाहट यह बताने को काफी था कि कुछ बड़ा होने वाला है। दरअसल, सदर विधायक शलभ मणि के प्रयासों से रविवार की दोपहर एक डर, एक जमी हुई आदत, एक मोड्स ऑपरेंडी टूट रही थी।। वही तरीका, जो बरसों से जानता था कि तुष्टिकरण के उस दौर में सरकारी जमीन पर कब्जा कैसे किया जाता है, काग़ज़ कैसे बनते हैं और सवाल पूछने वालों को कैसे चुप कराया जाता है।
विधायक शलभ मणि की पहल से सरकारी जमीन मुक्त
इस पूरे मामले में देवरिया सदर विधायक शलभ मणि त्रिपाठी की भूमिका को अहम माना जा रहा है। स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए विधायक ने यह मुद्दा सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष उठाया था। सदर विधायक ने हर साल मजार के बढ़ते दायरे और इससे जुड़ी कानून-व्यवस्था की आशंकाओं को तथ्यों के साथ रखा। इसके बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर जिला प्रशासन हरकत में आया और पूरे मामले की गहन जांच शुरू हुई।
जांच में सामने आया कि वर्ष 1992 में बंजर भूमि को फर्जी इंद्राज के जरिए मजार के नाम दर्ज कराया गया था। तहसील प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर एसडीएम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से जमीन को पुनः बंजर घोषित किया और इसमें संलिप्त अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। जैसे ही खतौनी में भूमि की स्थिति बदली, बुलडोजर कार्रवाई तय हो गई। स्थानीय लोगों का भी मानना है कि यदि विधायक ने यह मुद्दा लगातार और साहस के साथ न उठाया होता, तो यह अवैध कब्जा यूं ही बना रहता। वर्षों से जिस मामले को ‘छूने से भी बचा’ जा रहा था, वह आज निर्णायक अंजाम तक पहुंचा।
यहाँ, यह भी याद रखना जरूरी है कि शलभ मणि त्रिपाठी वही विधायक हैं, जिन्होंने बीते दिनों देवरिया में चल रहे धर्मांतरण के नेटवर्क को लेकर भी आवाज उठाई थी। उस मामले में भी उन्होंने सिर्फ बयान नहीं दिए, बल्कि प्रशासन को ठोस इनपुट दिए, जिसके बाद साज़िश में शामिल लोग जेल पहुंचे।
‘न्याय की जीत’ या ‘काला दिन’: देवरिया में ध्वस्तीकरण के बाद दो ध्रुवों में बंटी सियासत
ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पूरी होते ही देवरिया की राजनीति दो बिल्कुल अलग धाराओं में बंट गई। इस पूरे घटनाक्रम के बीच शलभ मणि त्रिपाठी के सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा का केंद्र बन गए। ध्वस्तीकरण के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, सत्यमेव जयते। स्व. रामनगीना यादव अमर रहें। पोस्ट के माध्यम से उन्होंने यह याद दिलाया कि इसी अवैध मजार के विरोध के चलते आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक स्वर्गीय राम नगीना यादव की हत्या कर दी गई थी।
वहीं समाजवादी पार्टी ने इस कार्रवाई को देवरिया के इतिहास का ‘काला दिन’ करार दिया और जल्दबाजी का आरोप लगाया। विपक्ष का कहना है कि धार्मिक भावनाओं की अनदेखी की गई और सत्ता के दबाव में कार्रवाई हुई। लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से इतर, शहर के एक बड़े हिस्से में चर्चा किसी और ही दिशा में थी। चाय की दुकानों, मोहल्लों और बाजारों में यह बात दोहराई जा रही थी कि पहली बार किसी जनप्रतिनिधि ने उस डर से टकराने की हिम्मत की है, जो वर्षों से सवाल पूछने से रोकता रहा।

