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Supreme Court on Loan Guarantor Liability: मुख्य उधारकर्ता और गारंटर पर एक साथ चलेगा CIRP, बैंकों को बड़ी राहत

Supreme Court on Loan Guarantor Liability: CIRP to be run simultaneously on the main borrower and the guarantor, a major relief to banks

द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : Supreme Court on Loan Guarantor Liability लोन लेते समय गारंटर बनना अक्सर एक औपचारिक प्रक्रिया समझा जाता है, लेकिन अब यह जिम्मेदारी और गंभीर हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि एक ही कर्ज के मामले में मुख्य उधारकर्ता (Principal Borrower) और कॉर्पोरेट गारंटर के खिलाफ एक साथ दिवाला प्रक्रिया (CIRP) शुरू की जा सकती है। यह फैसला Insolvency and Bankruptcy Code 2016 के तहत दिया गया है और इससे बैंकों को कर्ज वसूली में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए NCLAT के पुराने फैसले को खारिज कर दिया। इससे पहले National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) ने ‘विष्णु कुमार अग्रवाल बनाम पीरामल एंटरप्राइजेज’ मामले में कहा था कि एक ही कर्ज के लिए अलग-अलग गारंटर या उधारकर्ता के खिलाफ एक साथ CIRP नहीं चलाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सही नहीं माना।

गारंटर की जिम्मेदारी उधारकर्ता के बराबर

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि Indian Contract Act 1872 की धारा 128 के अनुसार गारंटर की देनदारी मुख्य उधारकर्ता के समान होती है। इसका मतलब है कि यदि कर्ज की अदायगी नहीं होती, तो बैंक एक साथ उधारकर्ता और सभी गारंटरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है।

पहले की व्यवस्था में यदि किसी एक गारंटर के खिलाफ CIRP शुरू हो जाती थी, तो उसी कर्ज के लिए दूसरे गारंटर या उधारकर्ता के खिलाफ अलग से प्रक्रिया शुरू करने पर रोक मानी जाती थी। इससे बैंकों को कर्ज वसूली में लंबा समय लगता था। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बैंक एक ही दिन में उधारकर्ता और सभी गारंटरों के खिलाफ अलग-अलग याचिकाएं दायर कर सकते हैं।

बैंकों को राहत, गारंटरों की जिम्मेदारी बढ़ी

इस फैसले से बैंक और वित्तीय संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। अब वे कर्ज की पूरी वसूली होने तक सभी जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ कार्रवाई जारी रख सकते हैं। यदि कंपनी की परिसंपत्तियां बेचने के बाद भी कर्ज की पूरी राशि नहीं मिलती है, तो बैंक गारंटर या प्रमोटर की व्यक्तिगत संपत्तियों पर दावा कर सकते हैं।

इसमें बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट, बैंक खाते की शेष राशि, म्यूचुअल फंड निवेश या यहां तक कि कमर्शियल प्रॉपर्टी को भी कुर्क कर सकता है। पहले गारंटर यह मानकर चलते थे कि जब तक कंपनी की दिवाला प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक उन पर सीधा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यह स्पष्ट संदेश देता है कि लोन गारंटी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी रूप से बाध्यकारी जिम्मेदारी है। ऐसे में किसी के लिए गारंटर बनने से पहले जोखिम और कानूनी परिणामों को गंभीरता से समझना आवश्यक है।

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Team The Loktantra

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