द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : AI Impact Summit 2026 में जिस तकनीकी प्रदर्शन को नवाचार की मिसाल बताया जा रहा था, वही अब विवाद और आलोचना का केंद्र बन गया है। गलगोटियास यूनिवर्सिटी के स्टॉल पर प्रदर्शित रोबोडॉग को ‘ओरियन’ नाम देकर विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उत्पाद बताया गया, लेकिन बाद में सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि यह चीन की कंपनी Unitree के Go2 मॉडल से मिलता-जुलता है।
‘मेक इन इंडिया’ थीम वाले अंतरराष्ट्रीय मंच पर विदेशी उत्पाद को स्वदेशी इनोवेशन के रूप में पेश किए जाने के आरोपों ने मामले को संवेदनशील बना दिया। आलोचकों का कहना है कि यदि तकनीकी स्रोत की पुष्टि किए बिना उसे घरेलू उत्पाद बताया गया, तो यह न केवल तथ्यों की चूक है बल्कि देश की साख पर भी सवाल खड़ा करता है।
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने तेजी से तूल पकड़ा और विपक्षी नेताओं ने भी इसे मुद्दा बनाया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘प्रचार’ करार देते हुए सवाल उठाए। इसके बाद विश्वविद्यालय को आधिकारिक रूप से माफी जारी करनी पड़ी।
माफी, सफाई और सवाल: क्या यह सिर्फ ‘कम्युनिकेशन गैप’ था?
यूनिवर्सिटी ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि पवेलियन पर मौजूद प्रतिनिधि को प्रोडक्ट की तकनीकी उत्पत्ति की पूरी जानकारी नहीं थी और उत्साह में आकर उसने गलत बयान दे दिया। संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित व्यक्ति को मीडिया से बात करने की आधिकारिक अनुमति नहीं थी।
हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के टेक समिट में प्रदर्शित उत्पाद की पृष्ठभूमि और ब्रांडिंग की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या यह केवल एक प्रतिनिधि की गलती थी, या फिर संस्थागत स्तर पर सत्यापन की कमी? AI समिट जैसे मंच पर जहां विदेशी प्रतिनिधि, निवेशक और टेक विशेषज्ञ मौजूद रहते हैं, वहां किसी भी प्रकार की तथ्यात्मक चूक सीधे-सीधे संस्थान और देश की छवि से जुड़ जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे आयोजनों में पारदर्शिता और तकनीकी स्पष्टता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर पेश किए जा रहे उत्पादों की प्रामाणिकता की जांच कितनी सख्ती से होनी चाहिए। फिलहाल, गलगोटियास यूनिवर्सिटी ने खेद जताकर स्थिति को संभालने की कोशिश की है, लेकिन यह विवाद लंबे समय तक चर्चा में रह सकता है और संस्थान की विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है।

