द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने लोकसभा में पेश किए गए जन विश्वास (संशोधन) विधेयक 2025 को वापस ले लिया है। यह फैसला सेलेक्ट कमेटी द्वारा सुझाए गए संशोधनों को शामिल करने के उद्देश्य से लिया गया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार को इस बिल को वापस लेने की घोषणा की।
यह विधेयक पहले 2025 के मानसून सत्र में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य कई पुराने और जटिल कानूनों में संशोधन कर छोटे-मोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाना था। इसके जरिए सरकार व्यापार करने और आम जीवन को आसान बनाने के साथ-साथ न्यायपालिका पर बोझ कम करना चाहती थी।
सरकार का मानना है कि कई मामलों में लोग अनजाने में नियमों का उल्लंघन कर देते हैं, ऐसे में सीधे दंड देने के बजाय चेतावनी और प्रशासनिक स्तर पर समाधान अधिक प्रभावी हो सकता है। यही कारण है कि इस बिल में अदालतों की बजाय वैकल्पिक व्यवस्था जैसे जुर्माना, समझौता और प्रशासनिक कार्रवाई को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।
व्यापार और आम जीवन को आसान बनाने पर जोर
जन विश्वास बिल 2025, पहले से लागू 2023 के जन विश्वास कानून का विस्तार माना जा रहा था। इसका मुख्य फोकस छोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से हटाकर व्यवसायों पर अनुपालन का दबाव कम करना और निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाना था। इस विधेयक में कृषि, उद्योग और अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव था, ताकि नियमों को सरल और पारदर्शी बनाया जा सके। सरकार का लक्ष्य एक ऐसा सिस्टम विकसित करना है जिसमें ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ की नीति के तहत अनावश्यक कानूनी अड़चनों को हटाया जा सके।
हालांकि, सेलेक्ट कमेटी ने कुछ प्रावधानों पर संशोधन की जरूरत बताई थी, जिसके बाद सरकार ने इसे वापस लेकर दोबारा संशोधित रूप में पेश करने का निर्णय लिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम दिखाता है कि सरकार कानूनों को अधिक व्यावहारिक और संतुलित बनाने की दिशा में काम कर रही है। आने वाले समय में इस बिल का संशोधित संस्करण संसद में पेश किया जा सकता है, जो व्यापारिक माहौल को और अधिक सरल और भरोसेमंद बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

